About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Wednesday, May 26, 2010

वही कहूंगा, जो अच्छा लगेगा

वही कहूंगा, जो हमें अच्छा लगेगा। या, वही कहूंगा जो हमें सूट करेगा। भारतीय मीडिया इन दिनों शायद इसी नारे पर काम कर रही है। पिछले दिनों की दो अहम घटनाएं आपके सामने पेश कर रहा हूं। दोनों को मीडिया ने जिस तरह से पेश किया, उसने फिर जाहिर कर दिया है कि चीजों को देखने का मीडिया का नजरिया कितना संकुचित और सतही हो चुका है। या फिर यूं कहें कि खबरों को सनसनीखेज करके चलाने का दबाव ऐसा है कि अगर एक चैनल ने कोई लाइन ले ली, तो फिर दूसरा चैनल उस पर कुछ सोचने की जहमत नहीं उठाता। और उसी का दबाव अगले दिन अखबारों पर भी दिखता है।
पिछले दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में एक बयान दिया था। नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की अपील की थी। कहा था कि इतिहास गवाह है कि हिंसा के रास्ते से कभी भी कुछ पाया नहीं जा सका। ऐसे में नक्सलियों को बातचीत की मेज पर आना ही होगा। जरा आप सोचिये, इससे ज्यादा पॉलिटिकली करेक्ट या गैरविवादास्पद बयान और क्या हो सकता है। लेकिन, तुरंत बाद चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज दिखने लगा कि मोदी ने नक्सलवाद पर बीजेपी से अलग स्टैंड लिया। अब आप ही सोचिये क्या मोदी के इन बयानों से लगता है कि वो पार्टी लाइन से दूर चले गए? बीजेपी का मत है कि जब नक्सली बंदूक नहीं छोड़ते उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। गृहमंत्री पी चिदंबरम भी इसी के हक में हैं। लेकिन, मोदी का जो बयान मीडिया में उद्धृत किया गया उसमें कहीं भी ऐसा नहीं है कि जिसमें वो कह रहे हों कि नक्सलियों पर नरमी बरती जाए। वो तो सिर्फ नक्लसियों को नसीहत दे रहे थे कि हिंसा ठीक नहीं।
बहरहाल मीडिया मुद्दे का गलत विश्लेषण कर दो हाथ आगे बढ़ चुका था। इसके बाद मोदी से फिर सवाल हुए। उन्होंने फिर बातें साफ कीं, लेकिन मीडिया की शरारत देखिये। नई हेडलाइन बनी-मोदी ने दी सफाई। वाह जनाब। चित भी मेरी पट भी मेरी।
दूसरा मुद्दा कुरुक्षेत्र के कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल का है। जिंदल ने खाप पंचायत को चिट्ठी लिखी। भरोसा दिया कि सगोत्र विवाद पर वो अपनी पार्टी में बात रखेंगे। हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करने के लिए संसद में मुद्दा उठाएंगे। परंपराओं की भी दुहाई दी। मीडिया ने इसे इस तरह पेश किया मानो खाप पंचायत की हर बुरी चीज के साथ हों जिंदल। यहां तक कि उन्हें ऑनर किलिंग के पक्षधर के रूप में भी दिखा दिया गया।
अब आप बताइये जिंदल जिस इलाके के नुमाइंदे हैं वहां सगोत्री शादी का मुद्दा लगातार गर्म है। लड़के-लड़कियों की हत्याएं हो रही हैं। ऐसे में क्या कोई संवेदनशील या जागरूक सांसद ज्यादा दिनों तक इस समस्या से मुंह मोड़े रख सकता है। फिर, उन्होंने तो सगोत्री शादी को लेकर ऑनर किलिंग के बारे में तो कुछ कहा तक नहीं था। उन्होंने सिर्फ मसले को पार्टी फोरम और संसद में उठाने का वादा किया था। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में इससे अच्छी बात क्यो हो सकती कि विवादास्पद मसले पर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश की जाए। हम सब जानते हैं देश के कई हिस्सों में सगोत्री विवाह वर्जित है। जानबूझकर कभी कोई अपनी बेटी का रिश्ता अपने गोत्र के लड़कों के घर नहीं ले जाता। ये परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। ऐसे में कुछ लोग परंपरा को लगातार तोड़ने पर उतारू हों और समाज में इससे तनाव बढ़ रहा हो तो तनाव शिथिल करने के लिए बातचीत तो जरूरी ही है। लेकिन, नहीं मीडिया ने उन्हें दकियानूस करार दे दिया गया। स्लग लिखा-आधुनिक शिक्षा, लेकिन पुरानी सोच। लेकिन, मीडिया ने इसका दूसरा पहलू देखने की कोशिश नहीं की कि विदेश में पढ़ा लिखा शिक्षित नौजवान भी आखिर परंपरा की दुहाई क्यों दे रहा है? शायद इन पहलुओं को देखने से खबर की लाइन भटक जाती। सनसनीखेज हेडलाइन्स नहीं बन पाती और दर्शकों को परोसने में चटखारेदार नहीं रह जाती।