About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Saturday, May 16, 2015

ये मीडिया गैरजिम्मेदार है

आखिरकार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के हेडकांस्टेबल सतीश चंद्र को जमानत मिल गई। मुमकिन है कि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद महिला को ईंट से मारने के आरोपों से वो बरी हो जाएं और उनकी नौकरी भी वापस मिल जाए जो गैर जिम्मेदार मीडिया कवरेज की वजह से दिल्ली पुलिस ने आनन-फानन में छीन ली थी।
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस का पत्थर कांड
पुरानी कहावत है जो दिखता है वैसा हो, ये हमेशा नहीं होता। टीआरपी की अंधी दौड़ में न्यूज चैनल्स इस पाठ को ही भूल गए लगते हैं। जिस रोज पत्थर कांड की 14 सेकेंड की क्लिप चैनलों पर आई सारी खबरें पीछे छूट गईं। न्यूज चैनलों में हो़ड़ शुरू हो गई नीचे गिरने की। आनन-फानन में फैसला सुना दिया गया कि दिल्ली पुलिस पत्थरमार है। बस 14 सेकेंड की क्लिप ने दिल्ली पुलिस की साख पर बट्टा लगा दिया। सतीश चंद्र की सत्ताइस साल की कमाई खाक हो गई। वो विलेन बन गए। ना किसी ने उनका पक्ष जानने की कोशिश की, ना ही किसी ने उस महिला की कहानी पर सवाल खड़ा करने की कोशिश की जो पलभर में टीवी स्टार बन चुकी थी। ऐसा नहीं था कि वीडियो क्लिपिंग में सवाल की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि जिस वक्त मैंने टीवी पर वो वीडियो देखा था उसी वक्त मेरे मन में घटना को लेकर सवाल खड़े हुए थे। सबसे बड़ा सवाल ईंट मारने को लेकर था।  हेड कांस्टेबल सतीश चंद्र ने ईंट मारी थी जरूर लेकिन क्या वो महिला को लगी थी? वीडियो में साफ था सतीश चंद्र के हाथ से जैसे ही ईंट छूटती है महिला पलटकर उसकी तरफ झपटती है। जरा सोचिये, अगर किसी की पीठ पर ईंट लगे वो फौरन पलटवार करने की स्थिति में होगा क्या? उसका पहला रिएक्शन होगा कि वो पीठ पकड़कर बैठ जाएगा लेकिन वीडियो में कहीं भी नहीं  दिखता कि महिला ईंट लगने से दर्द से बिलबिला हो उठी हो। यानी सतीशचंद्र ने ईंट उठाई जरूर लेकिन सिर्फ डराने के लिए और वो भी महिला के हिंसक रूप को देखने के बाद। लेकिन हमारे महान टीवी संपादकों ने इस पर गौर करने की जरुरत नहीं समझी क्योंकि पुलिस, सरकार या किसी संस्था को विलेन बनाकर पेश करना हमेशा आसान होता है और इससे कॉपी भी अच्छी बनती है और दर्शक भी इससे जुड़ते हैं। अगर मीडिया महिला के खिलाफ स्टैंड लेता तो शायद संपादकों को डर है कि दर्शकों में खबर को लेकर उतनी रुचि नहीं होगी।
लेकिन, कहते हैं सच्चाई को कितना भी ढँकने की कोशिश करो सच कभी छिप नहीं सकता। अगले ही रोज सतीश चंद्र द्वारा रिकार्ड झगड़े के ऑडियो ने पूरी कहानी को पलटकर रख दिया। ऑडियो से साफ हो गया कि ट्रैफिक लाइट जंप करने वाली महिला लाइसेंस और आरसी नहीं दिखाना चाहती थी। यहां तक कि उसने पुलिस को टुच्चा कहकर उकसाने की कोशिश की और सतीश चंद्र पर वायलेंट भी हुई। बाद में ये भी सामने आया है कि सरकारी अस्पताल ने एक्सरे और एमआरआई जांच में पाया कि महिला को कोई गंभीर चोट नहीं लगी है। उसका हाथ भी फ्रैक्चर नहीं हुआ है। महिला को उसी रोज डिस्चार्ज भी कर दिया था। यानी, महिला ने सहानुभूति पाने के लिए जो कहानी बुनी उसमें वो खुद ही उलझती नजर आ रही है।
सवाल उठता है कि मीडिया ने ये तफ्तीश करने की कोशिश पहले क्यों नहीं की? क्यों सिर्फ 14 सेकेंड के वीडियो पर भरोसा कर लिया? क्यों सिर्फ महिला के आरोप पर भरोसा कर लिया? मीडिया ने क्यों और चश्मदीदों से बात करने की कोशिश नहीं की? याद कीजिए। रोहतक चलती बस में छेड़छाड़ के मामले को। वहां भी मीडिया ने दो बहनों को रातोंरात स्टार बना दिया था  और फिर कुछ दिनों में ही पूरी कहानी पलट गई। आखिरी मीडिया ने उस मामले से सीख क्यों नहीं ली? क्या सिर्फ टीआरपी के लिए? टीवी संपादकों को इसका जवाब देना चाहिए।

Tuesday, January 14, 2014

न्यूज चैनलों का ढकोसलापन

देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों अजीब का ट्रेंड चल पड़ा है। जब अपनी करनी पर उंगली उठने लगे तो खुद एक कार्यक्रम कर भाड़े के मेहमानों से क्लीन चिट ले लो। ताजा मामला है एबीपी न्य़ूज का। 13 जनवरी को शाम छह से सात बजे
'आप' पर मेहरबान मीडिया? नाम से एक परिचर्चा देख रहा था। बहस के निशाने पर थी बीजेपी क्योंकि 12 जनवरी को गोवा में नरेंद्र मोदी ने इशारों-इशारों में अरविंद केजरीवाल पर सवाल खड़ा किया था कि देश को टेलीविजन पर दिखने वाले नेता चाहिए या फिर धरती पर विजन रखने वाले नेता?
मोदी के निशाने पर केजरीवाल थे लेकिन चोट लगी थी एबीवी न्यूज को। हो भी क्यों ना, पिछले करीब महीने भर न्यूज चैनलों में आम आदमी पार्टी के अलावा दिखाया जा रहा है। कभी विधानसभा की लाइव कवरेज आपने देखी थी कब तक? कभी किसी राज्य के मुख्यमंत्रियों की शपथ देखी आपने अब तक? कभी किसी मंत्री को इतना फॉलो किया गया अब तक? कभी किसी सीएम की हर प्रेस कांफ्रेंस को कवरेज मिला था अब तक? लेकिन पिछले एक महीने से भी ज्यादा वक्त से ये सब हो रहा है। हाल ये है कि कुमार विश्वास जैसे नेताओं को भी मीडिया की फौज अमेठी पहुंच गई। आखिर ये कैसी पत्रकारिता है?
न्यूज चैनल देखने वाला कोई भी शख्स बगैर किसी हिचकिचाहट बता देगा कि टीवी पर पागलों की तरह आम आदमी पार्टी को फॉ़लो किया जा रहा है। लेकिन पता नहीं क्योंकि एबीवी न्यूज को इसके लिए बहस करने की जरुरत पड़ गई। ओह... मैं तो भूल ही गया कि बहस ये जानने के लिए नहीं थी कि मीडिया
'आप' पर मेहरबान है या नहीं बल्कि बहस भाड़े के जानकारों से क्लीन चिट लेने की थी कि हम जो कुछ कर रहे हैं उसमें गलत कुछ नहीं।
बहस के दौरान एंकर नेहा पंत बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल को बड़े प्यार से सफाई दे रही थीं कि जब मीडिया नरेंद्र मोदी को दिखाता था तब क्यों नहीं सवाल उठे?
मेरा कहना है कि तब भी सवाल उठाना चाहिए था। तब भी मीडिया को कठघरे में खड़ा करना चाहिए था। लेकिन कठघरे में खड़ा करे कौन? आपकी माइक, आपका कैमरा, आपका स्टूडिया। वहां को निष्कर्ष वही निकलेगा जो आप निकालना चाहेंगे। मीडिया में सच्चाई की किसे फिक्र है। आपको बस किरदार चाहिए। याद कीजिए। कभी इन्हीं चैनलों पर राहुल गांधी की धूम हुआ करती थी। राहुल ने पादा नहीं कि खुशबू टीवी के संपादकों तक पहुंच गई। सारे चैनलों पर पाद का विश्लेषण शुरू। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी के आर्काइवल वीडियो निकालकर प्रोग्रामिंग शुरू।
राहुल का युग बीता तो नरेंद्र मोदी सामने आए। नरेंद्र मोदी के भाषणों का कवरेज पागलपन के इस लेवल तक पहुंचा कि उनकी औकात देश के पीएम पर भारी पड़ने लगी। अब उसी मोदी पर केजरीवाल भारी पड़ने लगे हैं। पता चला कुछ दिनों में केजरीवाल का जादू भी खत्म हो जाएगा और फिर कोई नया किरदार सामने आएगा। कुल मिलाकर न्यूज चैनलों को एक अदद किरदार चाहिए जो दर्शकों को उनसे जोड़े रख सके।
इसी बहस के दौरान एक अजीबोगरीब वाकया पेश आया। वरिष्ठ पत्रकार दिबांग जब अपनी बात रख रहे थे तभी सुधांशु मित्तल उन्हें टोकने लगे। दिबांग इससे इतने तिलमिलाए कि उन्होंने कहना शुरू कर दिया सुधांशु मित्तल मैं इस बात पर बहस नहीं कर रहा हूं कि आपको पैसे कहां से आते हैं? अपनी बात को दिबांग ने कई बार दोहराया। सवाल उठता है कि दिबांग आखिर कहना क्या चाहते थे? क्या सुधांशु मित्तल का कोई राज दिबांग को पता है? क्या सुधांशु मित्तल की वित्तीय अनियमितता के बारे में दिबांग को पता है? आखिर मित्तल को किस स्रोत से मिलने वाले पैसे का वो जिक्र कर रहे थे? अगर उनके पास वास्तव में ऐसी कोई जानकारी है तो पत्रकार होने के नाते उसे देश से साझा क्यों नहीं करते? क्या वो ब्लैकमेल करने के लिए ये जानकारी अपने तक सीमित रखना चाहते हैं? चलिए दिबांग अगर जानकारी अपने तक रखना चाहते हैं तो फिर एबीवी न्यूज ने इस पर चुप्पी क्यों साधी? एबीवी न्यूज के प्लेटफॉर्म पर दिबांग ये बात कह रहे थे। क्या एबीवी न्यूज का फर्ज नहीं था कि वो दिबांग से पूछें कि उनके पास ऐसी कौन सी जानकारी है? अगर एबीवी न्यूज को लगता है कि दिबांग बकवास कर रहे थे तो एंकर नेहा पंत को उसी वक्त कहना चाहिए था कि मिस्टर दिबांग आप बहस को विषयांतर ना करें। निजी बातें अपने तक रखें। लेकिन, अदने से एंकर को इतनी हिम्मत कहां। एंकर ही क्यों किसी चैनल को इतनी हिम्मत कहां अपनी बिरादरी के लोगों को कठघरे में करे। बहस का सार यही है सब ढकोसला है। न्यूज चैनल अपनी दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें उसी दुनिया में छोड़ देना चाहिए।

Saturday, January 14, 2012

टीम इंडिया हार रही है या ऑस्ट्रेलिया जीत रहा है?

देश में मातम मचा है। जिन सितारों को कुछ दिन पहले तक लोग सिर आंखों पर बिठाए इठलाए घूम रहे थे, उन्हें जमीन पर पटक दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया में हो रही टीम इंडिया की फजीहत से फैन्स तो फैन्स समीक्षक भी झल्लाए बैठे हैं। हालत ये हो चुकी है अब लोग सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे खिलाड़ियों को तकनीक दुरुस्त करने की सीख देने लगे हैं।
क्या आपको लगता है राहुल द्रविड़ को कोई खेलना सिखा सकता है? क्या आज की तारीख में सचिन तेंदुलकर को ये बताया जा सकता है कि ऐसे नहीं वैसे खेलो? लेकिन, आज ऐसा ही हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया में हो रही दुर्गति ने टीम इंडिया को खिलाड़ियों को छोड़कर हर किसी को क्रिकेट का पंडित बना दिया है।
मैं यहां कुछ गंभीर सवालों पर चर्चा करना चाहता हूं। क्या भारत की हार के लिए घटिया बल्लेबाजी कसूरवार है? क्या भारतीय गेंदबाजों को खराब गेंदबाजी के लिए बख्शा जा सकता है? क्या भारतीय हार का श्रेय ऑस्ट्रेलिया के शानदार खेल को देना हमारी शान में गुस्ताखी होगी? क्या हम ये मानने की विनम्रता नहीं दिखा सकते कि कंगारुओं ने बेहतर प्रदर्शन दिखाया?
इसमें दो राय नहीं कि कागज पर भारत का बैटिंग लाइन अप किसी भी टीम के मुकाबले कई गुणा मजबूत है। जिस टीम में सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण जैसे बल्लेबाज हों उसकी मजबूती की कल्पना कर सकते हैं। लेकिन क्या इन खिलाड़ियों के रहने भर से आप आश्वस्त हो सकते हैं कि भारत हर मैच में पांच सौ रन स्कोर बोर्ड पर टांग दे। ये मत भूलिये कि क्रिकेट में हर बल्लेबाज को शून्य से ही पारी की शुरुआत करनी होती है और किसी बल्लेबाज को आउट करने के लिए सिर्फ एक गेंद काफी होती है। अब देखिये ऑस्ट्रेलिया में हो क्या रहा है। ज्यादातर कंगारू गेंदबाज सटीक लाइन लेंग्थ पर गेंदबाजी कर रहे हैं। बल्लेबाजों को पसंद का शॉट्स खेलने के लिए रूम नहीं मिल रहा। उस पर कसी हुई फील्डिंग। आधा मौका भी दिया नहीं कि उसे लपकने के लिए तैयार हैं कंगारू। ऐसे में किसी भी खिलाड़ी का आउट होना लाजिमी है। पूरी सीरीज में सचिन या द्रविड़ के डिसमिसल को देख लीजिए। किसी ने विकेट नहीं फेका है बल्कि अच्छी गेंदों पर आउट हुए हैं। सिडनी में लक्ष्मण जिस गेंद पर आउट हुए उस पर दूसरा को भी बल्लेबाज अपनी किस्मत से ही बचता।
बेशक, टीवी पर मैच देखने से लगता है इस गेंद को ऐसे खेलना चाहिए था, उस गेंद को वैसे खेलना चाहिए था लेकिन मैदान का तनाव कुछ और होता है। जब पिच में जान हो और गेंदबाजी धारदार हो तो बल्लेबाज हर वक्त संदेह की स्थिति में होता है। गेंद को छोड़ें या रोकें या ड्राइव करें। हर बॉल को जज करना मुश्किल होता है और इसी में विकेट जाता है। पर्थ में माइकल क्लार्क, रिकी पॉन्टिंग और माइकल हसी इसकी मिसाल हैं। तीनों खिलाड़ी सिडनी से शानदार शतक बनाकर यहां पहुंचे थे लेकिन पर्थ में फिसड्डी साबित हुए। मेरे कहने का मतलब साफ है कंगारू गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजों को छूट नहीं दी और उसी का नतीजा है ये पतन।
अब बात गेंदबाजों की। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, वेस्टइंडीज.. इन देशों में कभी भी टीम इंडिया के फैन्स अपने बल्लेबाजों से रनों के अंबार की उम्मीद नहीं करते क्योंकि पिछले कुछ अपवादों को छोड़कर यहां हमेशा से उनका रिकार्ड खराब रहा है। लेकिन, वहां के अनुकूल वातावरण में तेज गेंदबाजों से हमेशा अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है। लेकिन, भारतीय गेंदबाजों ने क्या किया? सिडनी में सिर्फ चार विकेट ले पाए। पर्थ में 22 ओवरों में ही मैच ऑस्ट्रेलिया की झोली में डाल दिया। मेलबर्न में पुछल्ले बल्लेबाजों को आउट नहीं कर पाए। भारत के गेंदबाज कभी भी लगातार अच्छी गेंदबाजी नहीं कर पाए, जिससे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बेफिक्र होकर बल्लेबाजी करते रहे और उन पर कभी दबाव नहीं बन पाया। मेरे ख्याल से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज में गेंदबाजों को कमान संभालना चाहिए था जिसमें वो नाकाम रहे और टीम इंडिया की नाकामी की सबसे बड़ी वजह यही है।

Wednesday, May 26, 2010

वही कहूंगा, जो अच्छा लगेगा

वही कहूंगा, जो हमें अच्छा लगेगा। या, वही कहूंगा जो हमें सूट करेगा। भारतीय मीडिया इन दिनों शायद इसी नारे पर काम कर रही है। पिछले दिनों की दो अहम घटनाएं आपके सामने पेश कर रहा हूं। दोनों को मीडिया ने जिस तरह से पेश किया, उसने फिर जाहिर कर दिया है कि चीजों को देखने का मीडिया का नजरिया कितना संकुचित और सतही हो चुका है। या फिर यूं कहें कि खबरों को सनसनीखेज करके चलाने का दबाव ऐसा है कि अगर एक चैनल ने कोई लाइन ले ली, तो फिर दूसरा चैनल उस पर कुछ सोचने की जहमत नहीं उठाता। और उसी का दबाव अगले दिन अखबारों पर भी दिखता है।
पिछले दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में एक बयान दिया था। नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की अपील की थी। कहा था कि इतिहास गवाह है कि हिंसा के रास्ते से कभी भी कुछ पाया नहीं जा सका। ऐसे में नक्सलियों को बातचीत की मेज पर आना ही होगा। जरा आप सोचिये, इससे ज्यादा पॉलिटिकली करेक्ट या गैरविवादास्पद बयान और क्या हो सकता है। लेकिन, तुरंत बाद चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज दिखने लगा कि मोदी ने नक्सलवाद पर बीजेपी से अलग स्टैंड लिया। अब आप ही सोचिये क्या मोदी के इन बयानों से लगता है कि वो पार्टी लाइन से दूर चले गए? बीजेपी का मत है कि जब नक्सली बंदूक नहीं छोड़ते उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। गृहमंत्री पी चिदंबरम भी इसी के हक में हैं। लेकिन, मोदी का जो बयान मीडिया में उद्धृत किया गया उसमें कहीं भी ऐसा नहीं है कि जिसमें वो कह रहे हों कि नक्सलियों पर नरमी बरती जाए। वो तो सिर्फ नक्लसियों को नसीहत दे रहे थे कि हिंसा ठीक नहीं।
बहरहाल मीडिया मुद्दे का गलत विश्लेषण कर दो हाथ आगे बढ़ चुका था। इसके बाद मोदी से फिर सवाल हुए। उन्होंने फिर बातें साफ कीं, लेकिन मीडिया की शरारत देखिये। नई हेडलाइन बनी-मोदी ने दी सफाई। वाह जनाब। चित भी मेरी पट भी मेरी।
दूसरा मुद्दा कुरुक्षेत्र के कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल का है। जिंदल ने खाप पंचायत को चिट्ठी लिखी। भरोसा दिया कि सगोत्र विवाद पर वो अपनी पार्टी में बात रखेंगे। हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करने के लिए संसद में मुद्दा उठाएंगे। परंपराओं की भी दुहाई दी। मीडिया ने इसे इस तरह पेश किया मानो खाप पंचायत की हर बुरी चीज के साथ हों जिंदल। यहां तक कि उन्हें ऑनर किलिंग के पक्षधर के रूप में भी दिखा दिया गया।
अब आप बताइये जिंदल जिस इलाके के नुमाइंदे हैं वहां सगोत्री शादी का मुद्दा लगातार गर्म है। लड़के-लड़कियों की हत्याएं हो रही हैं। ऐसे में क्या कोई संवेदनशील या जागरूक सांसद ज्यादा दिनों तक इस समस्या से मुंह मोड़े रख सकता है। फिर, उन्होंने तो सगोत्री शादी को लेकर ऑनर किलिंग के बारे में तो कुछ कहा तक नहीं था। उन्होंने सिर्फ मसले को पार्टी फोरम और संसद में उठाने का वादा किया था। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में इससे अच्छी बात क्यो हो सकती कि विवादास्पद मसले पर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश की जाए। हम सब जानते हैं देश के कई हिस्सों में सगोत्री विवाह वर्जित है। जानबूझकर कभी कोई अपनी बेटी का रिश्ता अपने गोत्र के लड़कों के घर नहीं ले जाता। ये परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। ऐसे में कुछ लोग परंपरा को लगातार तोड़ने पर उतारू हों और समाज में इससे तनाव बढ़ रहा हो तो तनाव शिथिल करने के लिए बातचीत तो जरूरी ही है। लेकिन, नहीं मीडिया ने उन्हें दकियानूस करार दे दिया गया। स्लग लिखा-आधुनिक शिक्षा, लेकिन पुरानी सोच। लेकिन, मीडिया ने इसका दूसरा पहलू देखने की कोशिश नहीं की कि विदेश में पढ़ा लिखा शिक्षित नौजवान भी आखिर परंपरा की दुहाई क्यों दे रहा है? शायद इन पहलुओं को देखने से खबर की लाइन भटक जाती। सनसनीखेज हेडलाइन्स नहीं बन पाती और दर्शकों को परोसने में चटखारेदार नहीं रह जाती।

Thursday, February 25, 2010

क्रिकेट के देवता हैं सचिन

यकीन नहीं होता ये हुआ है, लेकिन जो अपनी आंखों से देखा, जो खबरों में देखा और पढ़ा उस पर तो यकीन करना ही पड़ेगा। वाकई ये किसी चमत्कार से कम तो नहीं, जिस पर तुरंत भरोसा हो जाए। जी हां, ग्वालियर (http://www.cricinfo.com/indvrsa2010/engine/current/match/441828.html) में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेले गए दूसरे वन-डे में सचिन की नाबाद 200 रनों की पारी को चमत्कार के सिवा और क्या कहेंगे आप? क्या कोई इंसान ऐसी पारी खेल सकता है?
नहीं, सचिन इंसान कहां हैं, उन्हें तो उनके फैन्स कब का क्रिकेट का भगवान बना चुके हैं। और ग्वालियर में इस भगवान ने अपना देवत्व दिखा ही दिया।
39 साल से ज्यादा बीत गए एक दिनी क्रिकेट को अस्तित्व में आए। याद कीजिए सालों तक इंग्लैंड में 60 ओवरों का मैच खेला जाता था। तब से अब तक ढेरों विस्फोटक बल्लेबाज आए। विवियन रिचर्ड्स, सनत जयसूर्या, गॉर्डन ग्रीनिज, ग्लेन टर्नर, मैथ्य़ू हेडन, शाहिद आफरीदी, सौरभ गांगुली गिनती लंबी है। लेकिन कोई बल्लेबाज 200 रन के माउंट एवरेस्ट पर नहीं पहुंच पाया।
1975 में ग्लेन टर्नर ने खेली थी 171 रनों की सबसे बड़ी पारी। फिर 1983 कपिल देव इसे 175 तक ले गए। दोनों मैच 60 ओवरों वाले थे,लेकिन तब भी कहा जाता था ये रिकार्ड कोई नहीं तोड़ पाएगा। फिर नौ साल बाद विवियन रिचर्ड्स 1984 में इसे 189 तक ले गए। 13 साल बाद 1997 में पाकिस्तान के सईद अनवर ने इसे 194 तक पहुंचाया। पिछले साल यानी 2009 में जिम्बाब्वे के अनजाने से बल्लेबाज चार्ल्स कॉवेंट्री दोहरे शतक के करीब पहुंचते दिखे, लेकिन अपने पार्टनर की बेवकूफी की वजह से 194 पर नाबाद रह गए। साफ है, रिकार्ड के माउंट एवरेस्ट के करीब पहुंच कर भी योद्धाओं के कदम लड़खड़ा गए। लेकिन, जब ईश्वर इंसान की वेश में हो तो फिर कदम कैसे लड़खड़ाएंगे। ईश्वर तो खुद अपनी कथा लिखता है। वो स्क्रिप्ट राइटर भी है और उसे निभाने वाला कलाकार भी। सचिन भी तो क्रिकेट मैदान में ऐसा ही करते आए हैं। अपनी कहानी खुद लिखते हैं। जब उनके खत्म होने की भविष्याणी होने लगती है, वो नई ऊंचाई के साथ सामने आ जाते हैं। बाकी फिर बौने दिखने लगते हैं।
बहुत कम लोगों को ये ध्यान होगा चेन्नई में सईद अनवर ने 194 रनों की जो रेखा खींची थी, उसे मिटाने की पटकथा भी उसी मैच में लिखी चुकी थी। जी हां, उस मैच में सचिन ने ही अनवर को आउट किया था। मानो उन्होंने अनवर से कह दिया था रुको 200 का ऐवरेस्ट तुम्हारे लिए नहीं है। इस पर मैं फतह करूंगा। बेशक साढ़े बारह साल लग सचिन को ये साबित करने में, लेकिन सचिन ने इसे साबित कर दिया।
क्रिकेट में सचिन तकरीबन हर बड़े रिकार्ड अपने नाम कर चुके हैं। बेशक, टेस्ट क्रिकेट में डॉन ब्रैडमेन के 99 के औसत को कोई पार नहीं कर पाएगा, लेकिन सचिन के अंतरराष्ट्रीय रनों और शतकों के रिकॉर्ड को भी भला कौन पार कर पाएगा? कोई इंसान 20 साल तक मशीन की तरह कैसे खेल पाएगा? इसी मोर्चे पर सचिन सर डॉन से आगे निकल जाते हैं। अब बस टेस्ट में 400 रन। सचिन, आपसे अब यही गुजारिश है।

Saturday, February 20, 2010

भज्जी ने दिखाया मीडिया को आईना

अच्छा लगा कोलकाता टेस्ट के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर फूटना। अच्छा लगा भज्जी का ये कहना कि वो या धोनी या टीम इंडिया का कोई और खिलाड़ी इडियट नहीं हैं। हरभजन सिंह का इशारा नागपुर टेस्ट में करारी हार के बाद न्यूज चैनलों में दिखाए गए कार्यक्रमों पर था, जिसमें कोई चैनल मैच का मुजरिम ढूंढ़ रहा था तो किसी को टीम इंडिया के पप्पू की तलाश थी।
ऐतिहासिक ईडन गार्डन में भज्जी टीम इंडिया की जीत के हीरो थे और उन्हें पूरा हक था मीडिया को आईना दिखाना। उनका ये कहना अच्छा लगा कि एक मैच की हार के बाद खिलाड़ियों के परफॉर्मेंस की इतनी नुक्ता-चीनी ठीक नहीं। खेल को खेल की तरह लो, इसे लड़ाई या राष्ट्र सम्मान का प्रतीक मत बनाओ।
भज्जी कहते हैं कि खिलाड़ियों को इडियट कहना प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन इसमें जरा-भी संवेदनशीलता नहीं। वाह भज्जी! तो अब आपको भी अहसास हो गया कि टीवी वाले प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए ऐसा करते हैं। यानी न्यूज चैनलों के जिस खोखलेपन को आम दर्शक महसूस कर रहे थे, उसे अब विश्वसनीय आवाज भी मिलने लगी है।
चूंकि मैं खुद एक पत्रकार हूं और न्यूज चैनल से जुड़ा हुआ हूं, लिहाजा मैं समझ सकता हूं भज्जी की कसक। न्यूज चैनलों का सपाट सा फॉर्मूला हो गया है। क्रिकेट बिकता है। टीम जीते तो आसमान पर चढ़ा दो, हारे तो खलनायक बना दो। यहां बीच का कोई रास्ता नहीं होता। हर मैच में न्यूज चैनलों का नजरिया बदलता रहता है। एक मैच में खिलाड़ी हीरो बन जाते हैं, दूसरे मैच में जीरो। अगर आप सचिन तेंदुलकर नहीं हैं तो आपका भगवान ही मालिक। क्योंकि सिर्फ सचिन तेंदुलकर ही एकमात्र खिलाड़ी हैं जिनकी न्यूज चैनलों पर ज्यादा आलोचना नहीं होती। आलोचना होती भी है तो पप्पू या इडियट की हद तक नहीं, भले ही मैच हराने में उनकी भूमिका क्यों ना हो।
दरअसल, न्यूज चैनलों में अतिरेक बिकता है या फिर अतिरेक को बेचने की कोशिश होती है। न्यूज चैनल या तो हीरो ढूंढ़ते हैं या फिर विलेन। कैरेक्टर आर्टिस्ट की यहां जगह नहीं है। खेल की बारीकियों पर बहस की यहां गुंजाइश नहीं होती, सिर्फ शोर होता है। आगे कभी आप गौर कीजिएगा क्रिकेट पर होने वाले न्यूज चैनलों के विशेष कार्यक्रमों पर। आधे घंटे आप देखते रह जाएंगे लेकिन आपको स्कोर का पता ही नहीं चलेगा। इसकी जगह आपको दिखेगा सिर्फ बकबास। या तो खिलाड़ियों को नीचा दिखाया जा रहा होगा या फिर उन्हें आसमान पर चढ़ाया जा रहा होगा। क्रिकेटीय समीक्षा कहीं नहीं मिलेगी। स्कोर मिलेगा तो सिर्फ टिकर या स्लग में।
कोलकाता टेस्ट को ही लीजिए। टीम इंडिया जीत गई और शुरू हो गया न्यूज चैनलों पर जीत का तराना। सारे चैनलों का रंग तिरंगा हो गया। पटाखे छूटने लगे। हर खिलाड़ी हीरो बन गया। जिस एक शख्स ने पूरे आठ घंटे तक टीम इंडिया को जीत से दूर रखा, जिसने एक वक्त पर टीम इंडिया में निराशा की लहर फैला दी थी, जीत के शोर में उसकी कोई चर्चा नहीं। जी हां, मैं बात हासिम अमला की कर रहा हूं। अगर क्रिकेटीय मैरिट पर बात होती तो अमला पर बहस की बहुत गुंजाइश होती। अमला के बहाने भारतीय क्रिकेटरों को कसौटी पर कसने की कोशिश हो सकती थी। लेकिन, न्यूज चैनलों ने जीत के शोर में इस पहलू को छुआ ही नहीं। शायद अमला से उन्हें अच्छी रेटिंग नहीं मिल सकती थी।
याद आता है कुछ साल पहले स्टार न्यूज ने वाह क्रिकेट में आक्रामक तेवर अपना रखे थे। हर बात पर खिलाड़ियों की ऐसी की तैसी। उनकी स्क्रिप्ट से ऐसा लगता था कि अगर स्टार के खेल पत्रकारों को कलम की जगह बल्ला या गेंद थमा दिया जाए तो वो सचिन और मुरली को पीछे छोड़ देंगे। इस वक्त वैसे ही तेवर इंडिया टीवी के हैं। खिलाड़ी तो उन्हें आला दर्जे के बेवकूफ और नौसिखुवे नजर आते हैं। जाहिर है, इन्हीं वजहों से न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता घटी है और अब खिलाड़ी भी मौका मिलता ही प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को जलील कर देते हैं।
तो बाज आयो मीडिया वालो। ये सीख गांठ बांध लो-तोल मोल के बोल। नहीं तो फिर कोई भज्जी तुम्हें आईना दिखाने आ जाएगा।

अमला को सलाम

वाह क्या पारी थी। आधुनिक टेस्ट क्रिकेट की बेहतरीन पारियों में एक। मुझे याद नहीं आता पिछले लंबे वक्त से किसी भारतीय बल्लेबाज ने ऐसी पारी खेली हो। हालांकि, सूरमा बल्लेबाजों की कमी नहीं अपने यहां। 499 मिनट, 394 गेंद। यानी आठ घंटे या 65 ओवर से भी ज्यादा बल्लेबाजी, फिर भी नाबाद। गजब!
ट्वेंटी-ट्वेंटी के जमाने जबकि विकेट पर टिक कर खेलना गुजरे जमाने की चीज हो गई है, दक्षिण अफ्रीका के हासिम अमला ने दिखा दिया विकेट पर टिकने की कला मरी नहीं। अमला की उत्कट जिजीविषा को सलाम।
जिस समय अमला अकेले दम पर (हालांकि उन्हें दूसरे छोर से भी पुछल्ले पर्याप्त सहयोग कर रहे थे) कोलकाता टेस्ट बचाने के मिशन में लगे थे, याद आ रहा था नागपुर टेस्ट। याद आ रहे थे वो सारे टेस्ट जिसे भारतीय क्रिकेट टीम ने मामूली लापरवाही से गवां दिया। याद कीजिए नागपुर टेस्ट। सचिन और धोनी शानदार बल्लेबाजी कर रहे थे। सचिन ने शतक पूरा किया और विकेट खो बैठे। सचिन ने उस शतक पर विकेट खोया, जिसे वो शतक से पहले नहीं खेल रहे थे। यानी सचिन के दिमाग में कहीं बैठा था ये शॉट जोखिम भरा है और इसे नाजुक वक्त पर खेलना ठीक नहीं। ये क्या दर्शाता है? यही ना कि सचिन के दिमाग अपना शतक सबसे ऊपर था, टीम को हार से बचाना नहीं? अगर सचिन के दिमाग में टीम ऊपर होती तो वो वैसा शॉट बिल्कुल नहीं खेलते। जितनी सावधानी उन्होंने 100 तक पहुंचने में बरती वो आगे भी बरतते। लेकिन नहीं, शतक पूरा हुआ और सचिन के लिए मिशन खत्म।
ये सिर्फ सचिन की बात नहीं है। याद करने पर भी आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिलेंगे जब नाजुक मैचों में भारतीय टीम का कोई मुख्य बल्लेबाज हासिम अमला की तरह नाबाद लौटा हो। हम पुछल्लों की लाख बुराई करें, लेकिन पहले तो मुख्य बल्लेबाजों को ही मिसाल पेश करना होगा ना।
इस वक्त मुझे याद आ रहे हैं एलन बॉर्डन और क्लाइव लॉयड। 1985-86 भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई थी। उस वक्त धर्मयुग के क्रिकेट विशेषांक में मंसूर अली खां पटौदी की समीक्षा पढ़ी थी। कंगारू टीम सिर्फ डेढ़ बल्लेबाजों की टीम है। एलन बॉर्डन एक बल्लेबाज और पूरी टीम आधी। लेकिन डेढ़ बल्लेबाजों की उसी टीम ने भारत को सीरीज ड्रा खेलने पर मजबूर कर दिया। जब टीम संकट में घिरी बॉर्डर चट्टान बनकर टिक गए। पुछल्लेबाजों के साथ उन्होंने लंबी-लंबी भागीदारी की। उनका एक ही फंडा था स्ट्राइक हमेशा अपने पास रखो।
उसी तरह 1983 में भारत-वेस्टइंडीज सीरीज में जब भी कपिल की टीम मेहमानों पर दबाव बनाया, लॉयड के पांव विकेट पर जम गए। उन्होंने निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ बड़ी-बड़ी भागीदारी की।
ये क्या दिखाता है? ये दिखाता है कि टीम के लिए बल्लेबाजी करना अलग बात है और रिकार्ड के लिए खेलना अलग बात। बेशक, सचिन आज बल्लेबाजी के शिखर पर हैं। सालों तक वो इसी तरह शिखर पर रहेंगे, लेकिन इससे विरोधी टीम को क्या फर्क करता है जब तक वो टीम के लिए रणनीति बनाकर बल्लेबाजी नहीं करते। विरोधी टीम के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है कि सचिन सिर्फ शतक बनाकर संतुष्ट हो जाएं। ये बात ना भूलें हारे हुए टेस्ट में आप शतक बनाते हैं या शून्य पर आउट होते हैं रन कोई मायने नहीं रखता। आपकी तारीफ तभी होगी जब आपने मैच बचा लिया या फिर आप अजेय लौटे। कम से कम तब आप कह पाएंगे कि आपको सपोर्ट नहीं मिला। सचिन आजतक ऐसे नहीं कर पाए। यही बात मुझे हमेशा परेशान करती है। यही बात आगे चलकर क्रिकेट के इतिहासकारों को भी कचोटेंगी। कन्फ्यूज करेंगी कि सचिन तेंदुलकर नाम शख्स को किस श्रेणी में रखें। रन को पैमाना बनाएंगे तो सचिन अतुलनीय नजर आएंगे और जरुरत के मुताबिक खेलने को पैमाना बनाएंगे तो शायद क्रिकेट के इस सूरज पर बादलों का धब्बा नजर आएगा।