About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Tuesday, January 14, 2014

न्यूज चैनलों का ढकोसलापन

देश के न्यूज चैनलों में इन दिनों अजीब का ट्रेंड चल पड़ा है। जब अपनी करनी पर उंगली उठने लगे तो खुद एक कार्यक्रम कर भाड़े के मेहमानों से क्लीन चिट ले लो। ताजा मामला है एबीपी न्य़ूज का। 13 जनवरी को शाम छह से सात बजे
'आप' पर मेहरबान मीडिया? नाम से एक परिचर्चा देख रहा था। बहस के निशाने पर थी बीजेपी क्योंकि 12 जनवरी को गोवा में नरेंद्र मोदी ने इशारों-इशारों में अरविंद केजरीवाल पर सवाल खड़ा किया था कि देश को टेलीविजन पर दिखने वाले नेता चाहिए या फिर धरती पर विजन रखने वाले नेता?
मोदी के निशाने पर केजरीवाल थे लेकिन चोट लगी थी एबीवी न्यूज को। हो भी क्यों ना, पिछले करीब महीने भर न्यूज चैनलों में आम आदमी पार्टी के अलावा दिखाया जा रहा है। कभी विधानसभा की लाइव कवरेज आपने देखी थी कब तक? कभी किसी राज्य के मुख्यमंत्रियों की शपथ देखी आपने अब तक? कभी किसी मंत्री को इतना फॉलो किया गया अब तक? कभी किसी सीएम की हर प्रेस कांफ्रेंस को कवरेज मिला था अब तक? लेकिन पिछले एक महीने से भी ज्यादा वक्त से ये सब हो रहा है। हाल ये है कि कुमार विश्वास जैसे नेताओं को भी मीडिया की फौज अमेठी पहुंच गई। आखिर ये कैसी पत्रकारिता है?
न्यूज चैनल देखने वाला कोई भी शख्स बगैर किसी हिचकिचाहट बता देगा कि टीवी पर पागलों की तरह आम आदमी पार्टी को फॉ़लो किया जा रहा है। लेकिन पता नहीं क्योंकि एबीवी न्यूज को इसके लिए बहस करने की जरुरत पड़ गई। ओह... मैं तो भूल ही गया कि बहस ये जानने के लिए नहीं थी कि मीडिया
'आप' पर मेहरबान है या नहीं बल्कि बहस भाड़े के जानकारों से क्लीन चिट लेने की थी कि हम जो कुछ कर रहे हैं उसमें गलत कुछ नहीं।
बहस के दौरान एंकर नेहा पंत बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल को बड़े प्यार से सफाई दे रही थीं कि जब मीडिया नरेंद्र मोदी को दिखाता था तब क्यों नहीं सवाल उठे?
मेरा कहना है कि तब भी सवाल उठाना चाहिए था। तब भी मीडिया को कठघरे में खड़ा करना चाहिए था। लेकिन कठघरे में खड़ा करे कौन? आपकी माइक, आपका कैमरा, आपका स्टूडिया। वहां को निष्कर्ष वही निकलेगा जो आप निकालना चाहेंगे। मीडिया में सच्चाई की किसे फिक्र है। आपको बस किरदार चाहिए। याद कीजिए। कभी इन्हीं चैनलों पर राहुल गांधी की धूम हुआ करती थी। राहुल ने पादा नहीं कि खुशबू टीवी के संपादकों तक पहुंच गई। सारे चैनलों पर पाद का विश्लेषण शुरू। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी के आर्काइवल वीडियो निकालकर प्रोग्रामिंग शुरू।
राहुल का युग बीता तो नरेंद्र मोदी सामने आए। नरेंद्र मोदी के भाषणों का कवरेज पागलपन के इस लेवल तक पहुंचा कि उनकी औकात देश के पीएम पर भारी पड़ने लगी। अब उसी मोदी पर केजरीवाल भारी पड़ने लगे हैं। पता चला कुछ दिनों में केजरीवाल का जादू भी खत्म हो जाएगा और फिर कोई नया किरदार सामने आएगा। कुल मिलाकर न्यूज चैनलों को एक अदद किरदार चाहिए जो दर्शकों को उनसे जोड़े रख सके।
इसी बहस के दौरान एक अजीबोगरीब वाकया पेश आया। वरिष्ठ पत्रकार दिबांग जब अपनी बात रख रहे थे तभी सुधांशु मित्तल उन्हें टोकने लगे। दिबांग इससे इतने तिलमिलाए कि उन्होंने कहना शुरू कर दिया सुधांशु मित्तल मैं इस बात पर बहस नहीं कर रहा हूं कि आपको पैसे कहां से आते हैं? अपनी बात को दिबांग ने कई बार दोहराया। सवाल उठता है कि दिबांग आखिर कहना क्या चाहते थे? क्या सुधांशु मित्तल का कोई राज दिबांग को पता है? क्या सुधांशु मित्तल की वित्तीय अनियमितता के बारे में दिबांग को पता है? आखिर मित्तल को किस स्रोत से मिलने वाले पैसे का वो जिक्र कर रहे थे? अगर उनके पास वास्तव में ऐसी कोई जानकारी है तो पत्रकार होने के नाते उसे देश से साझा क्यों नहीं करते? क्या वो ब्लैकमेल करने के लिए ये जानकारी अपने तक सीमित रखना चाहते हैं? चलिए दिबांग अगर जानकारी अपने तक रखना चाहते हैं तो फिर एबीवी न्यूज ने इस पर चुप्पी क्यों साधी? एबीवी न्यूज के प्लेटफॉर्म पर दिबांग ये बात कह रहे थे। क्या एबीवी न्यूज का फर्ज नहीं था कि वो दिबांग से पूछें कि उनके पास ऐसी कौन सी जानकारी है? अगर एबीवी न्यूज को लगता है कि दिबांग बकवास कर रहे थे तो एंकर नेहा पंत को उसी वक्त कहना चाहिए था कि मिस्टर दिबांग आप बहस को विषयांतर ना करें। निजी बातें अपने तक रखें। लेकिन, अदने से एंकर को इतनी हिम्मत कहां। एंकर ही क्यों किसी चैनल को इतनी हिम्मत कहां अपनी बिरादरी के लोगों को कठघरे में करे। बहस का सार यही है सब ढकोसला है। न्यूज चैनल अपनी दुनिया में जी रहे हैं। उन्हें उसी दुनिया में छोड़ देना चाहिए।