About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Sunday, January 31, 2010

टेलीविजन का 'अब क्यों' सिंड्रोम


सुबह स्टार न्यूज पर बहस गर्मागर्म थी। नोएडा ऑथरिटी ने अवैध मोबाइल टावरों को सील करना शुरू कर दिया है। लोग परेशान हैं। रिपोर्टर ऑन स्पॉट उन लोगों के साथ खड़े थे, जिनकी जिंदगी मोबाइल नेटवर्क की तरह जाम हो गई थी। नोएडा के एडिशनल सीईओ पीएन बॉथम से फोन पर संपर्क साधा गया। बाथम ने प्रशासन का पक्ष रखा। कार्रवाई का बचाव किया। कहा-ये टॉवर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए, बगैर इजाजत अवैध तरीके से रिहाइशी इलाकों में खड़े किए गए थे, इसलिए इन पर कार्रवाई जायज है।
यहां तक को सब ठीक चल रहा था, लेकिन इसके बाद एंकर और नोएडा ऑथरिटी के एडीशनल सीईओ के बीच जो बातें हुईं उसने एक बार फिर आज की सतही पत्रकारिता को नंगा कर दिया। बॉथम से एंकर सुमैरा खान पूछती हैं कि ये टॉवर पांच साल से लग रहे थे, तो कार्रवाई अब क्यों? बॉथम का जवाब था मोबाइल ऑपरेटरों को नोटिस भेजे गए थे। टॉवर धीरे-धीरे लग रहे थे। अब चूंकि समस्या गंभीर हुई है इसलिए कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन एंकर का सवाल बार-बार 'अब क्यों' पर अटका हुआ था।
मीडिया का ये 'अब क्यों' बहुत दिलचस्प सवाल है। अब क्यों? उस वक्त क्यों नहीं? स्टार न्यूज से पूछा जाना चाहिए क्या प्रशासन ने उस वक्त अगर थोड़ी लापरवाही बरती तो इसका मतलब क्या है अब कार्रवाई का हक नहीं बनता? मंत्रियों और अधिकारियों के एक-एक बयान की नुक्तानीची करने वाले मीडिया वालों को क्या इस वक्त नोएडा ऑथरिटी के साथ नहीं होना चाहिए जो देर से ही सही, एक जायज कार्रवाई के लिए सामने आया है?
ये बात हर कोई जानता है कि जब कोई नई चीज सामने आती है तो वो लोगों को सुविधाएं देता है तो पहले हम उसके दूसरे बुरे असर की अनदेखी करते हैं। मोबाइल के साथ भी ऐसा ही है। हर किसी की जिंदगी मोबाइल नेटवर्क से जुड़ गई है आज। ऐसे में मोबाइल कंपनियां बेहतर नेटवर्क के लिए धड़ाधड़ टॉवर लगा रही हैं। और ये टॉवर भी आम लोगों की छतों पर लग रहे हैं, जिन्होंने चंद कमाई के लिए खुद ही सुरक्षा मानकों से आंख मूंद रखा है।
ये मीडिया ही है जो लगातार इन खबरों को उछालता रहा है कि रिहाइशी बस्तियों में लगे मोबाइल टॉवर इंसानी सेहत के लिए खतरनाक हैं। चलिए, देर से ही सही कहीं से कोई कार्रवाई तो शुरू हुई है। ऐसे में इस कार्रवाई के पीछे खड़े होने की बजाय अगर मीडिया इसका साथ दे तो ज्यादा सही होगा। बेशक सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन उन लोगों से जिनकी छतों पर टॉवर लगे हैं। उनसे पूछना चाहिए क्या उन्हें इससे चिंता नहीं होती? टॉवर के आसपास रहने वालों को इससे पैदा होने वाले खतरों को बता कर पूछना चाहिए कि क्या मोबाइल नेटवर्क के लिए वो अपनी सेहत से समझौता कर सकते हैं? जो लोग मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने से परेशान हैं, उनसे पूछना चाहिए कि सिर्फ नेटवर्क से कनेक्ट रहने के लिए वो कितनी कीमत चुका सकते हैं? क्या वो इसके लिए अपने और अपने संतानों की सेहत दांव पर लगा सकते हैं? स्थानीय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि जब इतना बड़ा टॉवर खड़ा हो रहा था तो क्या उनकी आंखों पर पट्टी लगी थी?
बॉथम से उनके इस बयान पर, कि अगर मोबाइल ऑपरेटर अंडरटेकिंग दे दें तो आज ही सील तोड़ लिया जाएगा, पूछा जाना चाहिए कि क्या सिर्फ अंडरटेकिंग देने से सब ठीक हो जाएगा?
लेकिन, नहीं। मीडिया को सिर्फ 'अब क्यों?' का जवाब चाहिए क्योंकि इससे अच्छी हेडलाइन्स बन सकती है। नकारात्मक चीजें ऐसे भी लोगों की खींचती हैं। पता नहीं, कब इस प्रवृत्ति का अंत होगा।

नोट : इस खबर के दौरान स्टार न्यूज पर एक पीली पट्टी चल रही थी। अगर आपके इलाके में नेटवर्क खराब है तो स्टार न्यूज को फोन करें। दर्शकों के फोन मंगाने में हमेशा उत्सुक रहने वाला स्टार न्यूज भूल गया कि जिनका नेटवर्क खराब है वो भला कैसे फोन करेंगे और अगर कोई फोन करता है तो फिर नेटवर्क कैसे खराब हुआ।

Saturday, January 23, 2010

सहवाग से ज्यादा बड़बोले टीवी वाले


भारतीय क्रिकेट टीम चटगांव टेस्ट सौ से ज्यादा रनों से जीत गई, लेकिन टीवी वालों के चेहरे पर खुशी नहीं थी। पहला मौका था जब न्यूज चैनल टीम इंडिया की जीत का जश्न नहीं मना रहे थे। वजह- न्यूज चैनलों का एजेंडा पिट गया था। टेस्ट के पहले दिन से चैनल वाले सहवाग के बड़बोलेपन का जो ढोल पीट रहे थे, टेस्ट के आखिरी दिन टीम इंडिया ने उन्हीं की ढोल बजा दी। मैं पूछना चाहता हूं देश के खेल संपादकों से कि आखिर सहवाग का कसूर क्या था संपादक साहब?
चटगांव टेस्ट में नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जगह टीम की कप्तानी करने वाले वीरेंद्र सहवाग ने टेस्ट की पूर्वसंध्या पर कहा था बांग्लादेश साधारण टीम है। वो टेस्ट में हमारे बीस विकेट नहीं निकाल सकती। टेस्ट के पहले रोज 200 रनों से पहले बांग्लादेश ने टीम इंडिया के आठ विकेट निकाल लिए। बस न्यूज चैनलों को कैसे मौका मिल गया। बड़बोले वीरू, कहां गई हेकड़ी जैसे शीर्षक चैनलों पर चलने लगे। हर बड़ा और अदना खेल पत्रकार (सिर्फ टीवी वाले) सहवाग की खिंचाई करने लगा। ऐसा लग रहा था कि मानो हम इंडियन नहीं बल्कि बांग्लादेश का चैनल देख रहे हों। ऐसा लग रहा था कि मानो सहवाग ने कोई गलत बात कह दी हो। मानो सहवाग ने बांग्लादेश को गाली दे दी हो। अरे संपादक महोदय, टेस्ट मैच पांच दिनों का होता है। हर रोज तीन सेशन होते हैं, यानि पंद्रह सेशन। पहले दिन तीन सेशन में खराब खेल का मतलब ये नहीं होता कि दूसरी टीम ने बाजी मार ली। आप रिपोर्टिंग करते वक्त क्रिकेट का बुनियादी वसूल क्यों भूल जाते हैं?
अंततः हुआ भी वही। आखिरी दिन लंच से पहले ही पिट गया बांग्लादेश। अब आप बताइये सहवाग की बात सही साबित हई या नहीं? आप बताइये सहवाग ने क्या गलत कहा था। वीरू ने कहा बांग्लादेश हमारे बीस विेकेट नहीं ले सकता। भारत ने दूसरी पारी चार सौ से ज्यादा रन बनाकर घोषित कर दी और सहवाग की बात सही साबित हुई। लेकिन, विंडबना देखिये। सहवाग की शाबाशी देने की बजाय न्यूज चैनलों को ये जीत फीकी नजर आने लगी। किसी ने स्लेजिंग वाला मसला उठाया तो किसी ने ये बकवास की कि बांग्लादेश पर सौ रनों की जीत कोई जीत है। अरे नासमझो, क्रिकेट में जीत का मतलब जीत होता है। रिकार्डबुक ये दर्ज नहीं होता कि आपने कितना संघर्ष किया, रिकार्ड बुक से ये मतलब होता है आप जीते या हारे। ये सिर्फ क्रिकेट की बात नहीं, ये आम जिंदगी की बात है। चुनाव को ही लीजिए। उम्मीदवार एक वोट से चुनाव जीते या पांच लाख वोटों से दोनों ही सूरत में पांच साल तक ही वो सांसद या विधायक रह सकता। उसी तरह, पढ़ाई का मामला लीजिए। आप कितने पढ़े लिखे हैं इसका फैसला इम्तिहान के नतीजे से होता है। आपको नौकरी मिलेगी या नहीं ये उसके इम्तिहान के नतीजों से तय होगा। तो वही बात क्रिकेट के मैदान में है। भारत ने मैच जीत लिया। आखिरी सच्चाई यही है। लेकिन क्या करें अपने खेल संपादकों का। उन्हें तो बस कुतर्क करना है।

मुझे कहना है


जिंदगी में हर रोज ऐसा कुछ ना कुछ होता है कि आपको उस पर कुछ कहने को जी चाहता है। क्रिकेट में जीत गए तो आपका जी मचलने लगता है कुछ कहने को। दिनभर बिजली नहीं आई। आपके अंदर कुलबुलाहट मचने लगते हैं भंडास निकालने को। कोई चौक-चौराहे पर अपने मन का गुबार निकालता है, तो कोई अपने घर में। जिनके पास कलम है, जिनके पास किसी न्यूज़ चैनल का मंच है वो वहां मन का गुबार निकालते हैं। चूंकि उनकी पहुंच ज्यादा लोगों तक है इसलिए उनके कहे को सुनना पड़ता है। चाहे वो गलत ही क्यों ना बोलें। चाहे वो तर्क की जगह कुतर्क ही क्यों ना करें। उनकी बात सुनी जाती है। हालांकि, अक्सर उनकी बात सुनने के बाद लोग गरियाते ही हैं।
मेरे अंदर भी अक्सर ऐसी अकुलाहट होती है मीडिया में प्रकाशित, प्रसारित चीजों को लेकर। कई बार या कहें अक्सर मुझे लगता है कि मीडिया ने तर्क की जगह कुतर्क का सहारा लिया। मीडिया ने अपना एजेंडा चलाने की कोशिश की। खबर को बेचने के लिए मीडिया ने बिना वजह घटना को रंग देने की कोशिश की। लेकिन, कभी मैं कोई पत्रकार नहीं। किसी मीडिया संस्थान तक मेरी पहुंच नहीं। मैं कोई नेता नहीं। ना ही मेरा कोई मंच है। मैं एक पाठक हूं। एक समर्पित दर्शक हूं। लिहाजा मुझे लगा कि मुझे अपनी बात रखनी चाहिए। चूंकि शिकायती पत्र अक्सर अखबार वाले रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं। टीवी में फीडबैक की गुंजाइश नहीं। ऐेसे में मैंने सोचा क्यों ना मैं भी ब्लॉगिंग शुरू कर दूं। जब अमिताभ बच्चन ब्लॉग के लिए समय निकाल सकते हैं तो मैं क्यों नहीं। तो आज मैंने भी बना डाला अपना ब्लॉग। नाम है रिपोर्टर, जो हर रिपोर्टर की रिपोर्ट करेगा।

प्रस्तावना

जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं, तो मुझे भी कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो दूसरे नहीं कहते। जो टीवी नहीं करता। अखबार नहीं लिखते।