वही कहूंगा, जो हमें अच्छा लगेगा। या, वही कहूंगा जो हमें सूट करेगा। भारतीय मीडिया इन दिनों शायद इसी नारे पर काम कर रही है। पिछले दिनों की दो अहम घटनाएं आपके सामने पेश कर रहा हूं। दोनों को मीडिया ने जिस तरह से पेश किया, उसने फिर जाहिर कर दिया है कि चीजों को देखने का मीडिया का नजरिया कितना संकुचित और सतही हो चुका है। या फिर यूं कहें कि खबरों को सनसनीखेज करके चलाने का दबाव ऐसा है कि अगर एक चैनल ने कोई लाइन ले ली, तो फिर दूसरा चैनल उस पर कुछ सोचने की जहमत नहीं उठाता। और उसी का दबाव अगले दिन अखबारों पर भी दिखता है।
पिछले दिनों गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में एक बयान दिया था। नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छोड़ने की अपील की थी। कहा था कि इतिहास गवाह है कि हिंसा के रास्ते से कभी भी कुछ पाया नहीं जा सका। ऐसे में नक्सलियों को बातचीत की मेज पर आना ही होगा। जरा आप सोचिये, इससे ज्यादा पॉलिटिकली करेक्ट या गैरविवादास्पद बयान और क्या हो सकता है। लेकिन, तुरंत बाद चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज दिखने लगा कि मोदी ने नक्सलवाद पर बीजेपी से अलग स्टैंड लिया। अब आप ही सोचिये क्या मोदी के इन बयानों से लगता है कि वो पार्टी लाइन से दूर चले गए? बीजेपी का मत है कि जब नक्सली बंदूक नहीं छोड़ते उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। गृहमंत्री पी चिदंबरम भी इसी के हक में हैं। लेकिन, मोदी का जो बयान मीडिया में उद्धृत किया गया उसमें कहीं भी ऐसा नहीं है कि जिसमें वो कह रहे हों कि नक्सलियों पर नरमी बरती जाए। वो तो सिर्फ नक्लसियों को नसीहत दे रहे थे कि हिंसा ठीक नहीं।
बहरहाल मीडिया मुद्दे का गलत विश्लेषण कर दो हाथ आगे बढ़ चुका था। इसके बाद मोदी से फिर सवाल हुए। उन्होंने फिर बातें साफ कीं, लेकिन मीडिया की शरारत देखिये। नई हेडलाइन बनी-मोदी ने दी सफाई। वाह जनाब। चित भी मेरी पट भी मेरी।
दूसरा मुद्दा कुरुक्षेत्र के कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल का है। जिंदल ने खाप पंचायत को चिट्ठी लिखी। भरोसा दिया कि सगोत्र विवाद पर वो अपनी पार्टी में बात रखेंगे। हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन करने के लिए संसद में मुद्दा उठाएंगे। परंपराओं की भी दुहाई दी। मीडिया ने इसे इस तरह पेश किया मानो खाप पंचायत की हर बुरी चीज के साथ हों जिंदल। यहां तक कि उन्हें ऑनर किलिंग के पक्षधर के रूप में भी दिखा दिया गया।
अब आप बताइये जिंदल जिस इलाके के नुमाइंदे हैं वहां सगोत्री शादी का मुद्दा लगातार गर्म है। लड़के-लड़कियों की हत्याएं हो रही हैं। ऐसे में क्या कोई संवेदनशील या जागरूक सांसद ज्यादा दिनों तक इस समस्या से मुंह मोड़े रख सकता है। फिर, उन्होंने तो सगोत्री शादी को लेकर ऑनर किलिंग के बारे में तो कुछ कहा तक नहीं था। उन्होंने सिर्फ मसले को पार्टी फोरम और संसद में उठाने का वादा किया था। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में इससे अच्छी बात क्यो हो सकती कि विवादास्पद मसले पर सर्वसम्मति बनाने की कोशिश की जाए। हम सब जानते हैं देश के कई हिस्सों में सगोत्री विवाह वर्जित है। जानबूझकर कभी कोई अपनी बेटी का रिश्ता अपने गोत्र के लड़कों के घर नहीं ले जाता। ये परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। ऐसे में कुछ लोग परंपरा को लगातार तोड़ने पर उतारू हों और समाज में इससे तनाव बढ़ रहा हो तो तनाव शिथिल करने के लिए बातचीत तो जरूरी ही है। लेकिन, नहीं मीडिया ने उन्हें दकियानूस करार दे दिया गया। स्लग लिखा-आधुनिक शिक्षा, लेकिन पुरानी सोच। लेकिन, मीडिया ने इसका दूसरा पहलू देखने की कोशिश नहीं की कि विदेश में पढ़ा लिखा शिक्षित नौजवान भी आखिर परंपरा की दुहाई क्यों दे रहा है? शायद इन पहलुओं को देखने से खबर की लाइन भटक जाती। सनसनीखेज हेडलाइन्स नहीं बन पाती और दर्शकों को परोसने में चटखारेदार नहीं रह जाती।
About Me
- reporter
- पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।
Wednesday, May 26, 2010
Thursday, February 25, 2010
क्रिकेट के देवता हैं सचिन
यकीन नहीं होता ये हुआ है, लेकिन जो अपनी आंखों से देखा, जो खबरों में देखा और पढ़ा उस पर तो यकीन करना ही पड़ेगा। वाकई ये किसी चमत्कार से कम तो नहीं, जिस पर तुरंत भरोसा हो जाए। जी हां, ग्वालियर (http://www.cricinfo.com/indvrsa2010/engine/current/match/441828.html) में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेले गए दूसरे वन-डे में सचिन की नाबाद 200 रनों की पारी को चमत्कार के सिवा और क्या कहेंगे आप? क्या कोई इंसान ऐसी पारी खेल सकता है?नहीं, सचिन इंसान कहां हैं, उन्हें तो उनके फैन्स कब का क्रिकेट का भगवान बना चुके हैं। और ग्वालियर में इस भगवान ने अपना देवत्व दिखा ही दिया।
39 साल से ज्यादा बीत गए एक दिनी क्रिकेट को अस्तित्व में आए। याद कीजिए सालों तक इंग्लैंड में 60 ओवरों का मैच खेला जाता था। तब से अब तक ढेरों विस्फोटक बल्लेबाज आए। विवियन रिचर्ड्स, सनत जयसूर्या, गॉर्डन ग्रीनिज, ग्लेन टर्नर, मैथ्य़ू हेडन, शाहिद आफरीदी, सौरभ गांगुली गिनती लंबी है। लेकिन कोई बल्लेबाज 200 रन के माउंट एवरेस्ट पर नहीं पहुंच पाया।
1975 में ग्लेन टर्नर ने खेली थी 171 रनों की सबसे बड़ी पारी। फिर 1983 कपिल देव इसे 175 तक ले गए। दोनों मैच 60 ओवरों वाले थे,लेकिन तब भी कहा जाता था ये रिकार्ड कोई नहीं तोड़ पाएगा। फिर नौ साल बाद विवियन रिचर्ड्स 1984 में इसे 189 तक ले गए। 13 साल बाद 1997 में पाकिस्तान के सईद अनवर ने इसे 194 तक पहुंचाया। पिछले साल यानी 2009 में जिम्बाब्वे के अनजाने से बल्लेबाज चार्ल्स कॉवेंट्री दोहरे शतक के करीब पहुंचते दिखे, लेकिन अपने पार्टनर की बेवकूफी की वजह से 194 पर नाबाद रह गए। साफ है, रिकार्ड के माउंट एवरेस्ट के करीब पहुंच कर भी योद्धाओं के कदम लड़खड़ा गए। लेकिन, जब ईश्वर इंसान की वेश में हो तो फिर कदम कैसे लड़खड़ाएंगे। ईश्वर तो खुद अपनी कथा लिखता है। वो स्क्रिप्ट राइटर भी है और उसे निभाने वाला कलाकार भी। सचिन भी तो क्रिकेट मैदान में ऐसा ही करते आए हैं। अपनी कहानी खुद लिखते हैं। जब उनके खत्म होने की भविष्याणी होने लगती है, वो नई ऊंचाई के साथ सामने आ जाते हैं। बाकी फिर बौने दिखने लगते हैं।
बहुत कम लोगों को ये ध्यान होगा चेन्नई में सईद अनवर ने 194 रनों की जो रेखा खींची थी, उसे मिटाने की पटकथा भी उसी मैच में लिखी चुकी थी। जी हां, उस मैच में सचिन ने ही अनवर को आउट किया था। मानो उन्होंने अनवर से कह दिया था रुको 200 का ऐवरेस्ट तुम्हारे लिए नहीं है। इस पर मैं फतह करूंगा। बेशक साढ़े बारह साल लग सचिन को ये साबित करने में, लेकिन सचिन ने इसे साबित कर दिया।
क्रिकेट में सचिन तकरीबन हर बड़े रिकार्ड अपने नाम कर चुके हैं। बेशक, टेस्ट क्रिकेट में डॉन ब्रैडमेन के 99 के औसत को कोई पार नहीं कर पाएगा, लेकिन सचिन के अंतरराष्ट्रीय रनों और शतकों के रिकॉर्ड को भी भला कौन पार कर पाएगा? कोई इंसान 20 साल तक मशीन की तरह कैसे खेल पाएगा? इसी मोर्चे पर सचिन सर डॉन से आगे निकल जाते हैं। अब बस टेस्ट में 400 रन। सचिन, आपसे अब यही गुजारिश है।
Saturday, February 20, 2010
भज्जी ने दिखाया मीडिया को आईना
अच्छा लगा कोलकाता टेस्ट के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर फूटना। अच्छा लगा भज्जी का ये कहना कि वो या धोनी या टीम इंडिया का कोई और खिलाड़ी इडियट नहीं हैं। हरभजन सिंह का इशारा नागपुर टेस्ट में करारी हार के बाद न्यूज चैनलों में दिखाए गए कार्यक्रमों पर था, जिसमें कोई चैनल मैच का मुजरिम ढूंढ़ रहा था तो किसी को टीम इंडिया के पप्पू की तलाश थी।ऐतिहासिक ईडन गार्डन में भज्जी टीम इंडिया की जीत के हीरो थे और उन्हें पूरा हक था मीडिया को आईना दिखाना। उनका ये कहना अच्छा लगा कि एक मैच की हार के बाद खिलाड़ियों के परफॉर्मेंस की इतनी नुक्ता-चीनी ठीक नहीं। खेल को खेल की तरह लो, इसे लड़ाई या राष्ट्र सम्मान का प्रतीक मत बनाओ।
भज्जी कहते हैं कि खिलाड़ियों को इडियट कहना प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन इसमें जरा-भी संवेदनशीलता नहीं। वाह भज्जी! तो अब आपको भी अहसास हो गया कि टीवी वाले प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए ऐसा करते हैं। यानी न्यूज चैनलों के जिस खोखलेपन को आम दर्शक महसूस कर रहे थे, उसे अब विश्वसनीय आवाज भी मिलने लगी है।
चूंकि मैं खुद एक पत्रकार हूं और न्यूज चैनल से जुड़ा हुआ हूं, लिहाजा मैं समझ सकता हूं भज्जी की कसक। न्यूज चैनलों का सपाट सा फॉर्मूला हो गया है। क्रिकेट बिकता है। टीम जीते तो आसमान पर चढ़ा दो, हारे तो खलनायक बना दो। यहां बीच का कोई रास्ता नहीं होता। हर मैच में न्यूज चैनलों का नजरिया बदलता रहता है। एक मैच में खिलाड़ी हीरो बन जाते हैं, दूसरे मैच में जीरो। अगर आप सचिन तेंदुलकर नहीं हैं तो आपका भगवान ही मालिक। क्योंकि सिर्फ सचिन तेंदुलकर ही एकमात्र खिलाड़ी हैं जिनकी न्यूज चैनलों पर ज्यादा आलोचना नहीं होती। आलोचना होती भी है तो पप्पू या इडियट की हद तक नहीं, भले ही मैच हराने में उनकी भूमिका क्यों ना हो।
दरअसल, न्यूज चैनलों में अतिरेक बिकता है या फिर अतिरेक को बेचने की कोशिश होती है। न्यूज चैनल या तो हीरो ढूंढ़ते हैं या फिर विलेन। कैरेक्टर आर्टिस्ट की यहां जगह नहीं है। खेल की बारीकियों पर बहस की यहां गुंजाइश नहीं होती, सिर्फ शोर होता है। आगे कभी आप गौर कीजिएगा क्रिकेट पर होने वाले न्यूज चैनलों के विशेष कार्यक्रमों पर। आधे घंटे आप देखते रह जाएंगे लेकिन आपको स्कोर का पता ही नहीं चलेगा। इसकी जगह आपको दिखेगा सिर्फ बकबास। या तो खिलाड़ियों को नीचा दिखाया जा रहा होगा या फिर उन्हें आसमान पर चढ़ाया जा रहा होगा। क्रिकेटीय समीक्षा कहीं नहीं मिलेगी। स्कोर मिलेगा तो सिर्फ टिकर या स्लग में।
कोलकाता टेस्ट को ही लीजिए। टीम इंडिया जीत गई और शुरू हो गया न्यूज चैनलों पर जीत का तराना। सारे चैनलों का रंग तिरंगा हो गया। पटाखे छूटने लगे। हर खिलाड़ी हीरो बन गया। जिस एक शख्स ने पूरे आठ घंटे तक टीम इंडिया को जीत से दूर रखा, जिसने एक वक्त पर टीम इंडिया में निराशा की लहर फैला दी थी, जीत के शोर में उसकी कोई चर्चा नहीं। जी हां, मैं बात हासिम अमला की कर रहा हूं। अगर क्रिकेटीय मैरिट पर बात होती तो अमला पर बहस की बहुत गुंजाइश होती। अमला के बहाने भारतीय क्रिकेटरों को कसौटी पर कसने की कोशिश हो सकती थी। लेकिन, न्यूज चैनलों ने जीत के शोर में इस पहलू को छुआ ही नहीं। शायद अमला से उन्हें अच्छी रेटिंग नहीं मिल सकती थी।
याद आता है कुछ साल पहले स्टार न्यूज ने वाह क्रिकेट में आक्रामक तेवर अपना रखे थे। हर बात पर खिलाड़ियों की ऐसी की तैसी। उनकी स्क्रिप्ट से ऐसा लगता था कि अगर स्टार के खेल पत्रकारों को कलम की जगह बल्ला या गेंद थमा दिया जाए तो वो सचिन और मुरली को पीछे छोड़ देंगे। इस वक्त वैसे ही तेवर इंडिया टीवी के हैं। खिलाड़ी तो उन्हें आला दर्जे के बेवकूफ और नौसिखुवे नजर आते हैं। जाहिर है, इन्हीं वजहों से न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता घटी है और अब खिलाड़ी भी मौका मिलता ही प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को जलील कर देते हैं।
तो बाज आयो मीडिया वालो। ये सीख गांठ बांध लो-तोल मोल के बोल। नहीं तो फिर कोई भज्जी तुम्हें आईना दिखाने आ जाएगा।
अमला को सलाम
वाह क्या पारी थी। आधुनिक टेस्ट क्रिकेट की बेहतरीन पारियों में एक। मुझे याद नहीं आता पिछले लंबे वक्त से किसी भारतीय बल्लेबाज ने ऐसी पारी खेली हो। हालांकि, सूरमा बल्लेबाजों की कमी नहीं अपने यहां। 499 मिनट, 394 गेंद। यानी आठ घंटे या 65 ओवर से भी ज्यादा बल्लेबाजी, फिर भी नाबाद। गजब!ट्वेंटी-ट्वेंटी के जमाने जबकि विकेट पर टिक कर खेलना गुजरे जमाने की चीज हो गई है, दक्षिण अफ्रीका के हासिम अमला ने दिखा दिया विकेट पर टिकने की कला मरी नहीं। अमला की उत्कट जिजीविषा को सलाम।
जिस समय अमला अकेले दम पर (हालांकि उन्हें दूसरे छोर से भी पुछल्ले पर्याप्त सहयोग कर रहे थे) कोलकाता टेस्ट बचाने के मिशन में लगे थे, याद आ रहा था नागपुर टेस्ट। याद आ रहे थे वो सारे टेस्ट जिसे भारतीय क्रिकेट टीम ने मामूली लापरवाही से गवां दिया। याद कीजिए नागपुर टेस्ट। सचिन और धोनी शानदार बल्लेबाजी कर रहे थे। सचिन ने शतक पूरा किया और विकेट खो बैठे। सचिन ने उस शतक पर विकेट खोया, जिसे वो शतक से पहले नहीं खेल रहे थे। यानी सचिन के दिमाग में कहीं बैठा था ये शॉट जोखिम भरा है और इसे नाजुक वक्त पर खेलना ठीक नहीं। ये क्या दर्शाता है? यही ना कि
सचिन के दिमाग अपना शतक सबसे ऊपर था, टीम को हार से बचाना नहीं? अगर सचिन के दिमाग में टीम ऊपर होती तो वो वैसा शॉट बिल्कुल नहीं खेलते। जितनी सावधानी उन्होंने 100 तक पहुंचने में बरती वो आगे भी बरतते। लेकिन नहीं, शतक पूरा हुआ और सचिन के लिए मिशन खत्म।ये सिर्फ सचिन की बात नहीं है। याद करने पर भी आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिलेंगे जब नाजुक मैचों में भारतीय टीम का कोई मुख्य बल्लेबाज हासिम अमला की तरह नाबाद लौटा हो। हम पुछल्लों की लाख बुराई करें, लेकिन पहले तो मुख्य बल्लेबाजों को ही मिसाल पेश करना होगा ना।
इस वक्त मुझे याद आ रहे हैं एलन बॉर्डन और क्लाइव लॉयड। 1985-86 भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई थी। उस वक्त धर्मयुग के क्रिकेट विशेषांक में मंसूर अली खां पटौदी की समीक्षा पढ़ी थी। कंगारू टीम सिर्फ डेढ़ बल्लेबाजों की टीम है। एलन बॉर्डन एक बल्लेबाज और पूरी टीम आधी। लेकिन डेढ़ बल्लेबाजों की उसी टीम ने भारत को सीरीज ड्रा खेलने पर मजबूर कर दिया। जब टीम संकट में घिरी बॉर्डर चट्टान बनकर टिक गए। पुछल्लेबाजों के साथ उन्होंने लंबी-लंबी भागीदारी की। उनका एक ही फंडा था स्ट्राइक हमेशा अपने पास रखो।
उसी तरह 1983 में भारत-वेस्टइंडीज सीरीज में जब भी कपिल की टीम मेहमानों पर दबाव बनाया, लॉयड के पांव विकेट पर जम गए। उन्होंने निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ बड़ी-बड़ी भागीदारी की।
ये क्या दिखाता है? ये दिखाता है कि टीम के लिए बल्लेबाजी करना अलग बात है और रिकार्ड के लिए खेलना अलग बात। बेशक, सचिन आज बल्लेबाजी के शिखर पर हैं। सालों तक वो इसी तरह शिखर पर रहेंगे, लेकिन इससे विरोधी टीम को क्या फर्क करता है जब तक वो टीम के लिए रणनीति बनाकर बल्लेबाजी नहीं करते। विरोधी टीम के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है कि सचिन सिर्फ शतक बनाकर संतुष्ट हो जाएं। ये बात ना भूलें हारे हुए टेस्ट में आप शतक बनाते हैं या शून्य पर आउट होते हैं रन कोई मायने नहीं रखता। आपकी तारीफ तभी होगी जब आपने मैच बचा लिया या फिर आप अजेय लौटे। कम से कम तब आप कह पाएंगे कि आपको सपोर्ट नहीं मिला। सचिन आजतक ऐसे नहीं कर पाए। यही बात मुझे हमेशा परेशान करती है। यही बात आगे चलकर क्रिकेट के इतिहासकारों को भी कचोटेंगी। कन्फ्यूज करेंगी कि सचिन तेंदुलकर नाम शख्स को किस श्रेणी में रखें। रन को पैमाना बनाएंगे तो सचिन अतुलनीय नजर आएंगे और जरुरत के मुताबिक खेलने को पैमाना बनाएंगे तो शायद क्रिकेट के इस सूरज पर बादलों का धब्बा नजर आएगा।
Tuesday, February 9, 2010
ये कर्म का फल नहीं है संपादकजी
आज दिल्ली से निकलने वाले अखबार हिन्दुस्तान का पहला पेज देखिये। तस्वीरों के साथ सात कॉलम में खबर छपी है- कर्म का फल : रुचिका से छेड़छाड़ के दोषी राठौर पर अदालत के बाहर चाकू से हुआ हमला।
वाह संपादक महोदय। तो क्या अब अखबार भी सड़क के इंसाफ में यकीन करने लगे हैं? क्या हिन्दुस्तान के संपादक को अदालत पर भरोसा नहीं रहा? अगर होता तो शायद राठौर पर चंडीगढ़ कोर्ट के बाहर हुए हमले को कर्म का फल नहीं कहते। सार्वजनिक रूप से ये कहने की हिम्मत तो रुचिका पक्ष के लोग भी नहीं कर पाए। रुचिका की सहेली आराधना और उनके पिता आनंद प्रकाश ने बिल्कुल सतर्क प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। यही सभ्य समाज का तकाजा भी है। इसी से ही सुचारु व्यवस्था चल सकती है। इसी रास्ते से सही इंसाफ भी मिल सकता है।
लेकिन, अगर कोई अखबार किसी हमले को कर्म का फल कहने लगे तो डर लगने लगता है। ये ठीक है कि राठौर एक अदालत से दो महीने की सजा पा चुके हैं, लेकिन अभी दूसरी अदालतों में उनका ट्रायल चल रहा है। ऐसे में उनके कर्मों का फल तय करने वाले अखबार वाले कैसे हो सकते हैं? क्या एक तरह ये उकसाने वाली कार्रवाई नहीं है? क्या इससे समाज में गलत संदेश नहीं जा रहा? कल अगर हिन्दुस्तान के संपादक पर कोई गंभीर आरोप लगाता है और फिर उन पर ऐसा ही कुछ होता है तो क्या इसे कर्मों का फल कहना उचित लगेगा उन्हें?
लेकिन, अखबारों में ऐसा अतिरेक पहली बार नहीं हुआ है। एक अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर मुझे आज भी याद है। कटिंग मेरे पास नहीं है इसलिए नाम का उल्लेख नहीं कर रहा। खबर ये थी कि बलात्कार के एक आरोपी की बहन के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कार उस लड़की के भाई ने किया था, जिसके साथ आरोपी ने बलात्कार किया था। ये खबर कुछ इस तरह लिखी गई थी। ऊपर वाले की लाठी जब चलती है तो आवाज नहीं करती है। ये ऊपर वाले का इंसाफ है। ना तो रिपोर्टर ने ना ही संपादक ने इतनी संवेदना समझी कि किसी के भाई ने अगर बलात्कार किया है तो उस बहन का क्या दोष? क्या बलात्कार के बदले बलात्कार ऊपर वाले का न्याय हो सकता है?
जाहिर है ऐसे मामलों में संपादकों को थोड़ा विवेक से काम लेना चाहिए और तठस्थ होकर रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
वाह संपादक महोदय। तो क्या अब अखबार भी सड़क के इंसाफ में यकीन करने लगे हैं? क्या हिन्दुस्तान के संपादक को अदालत पर भरोसा नहीं रहा? अगर होता तो शायद राठौर पर चंडीगढ़ कोर्ट के बाहर हुए हमले को कर्म का फल नहीं कहते। सार्वजनिक रूप से ये कहने की हिम्मत तो रुचिका पक्ष के लोग भी नहीं कर पाए। रुचिका की सहेली आराधना और उनके पिता आनंद प्रकाश ने बिल्कुल सतर्क प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। यही सभ्य समाज का तकाजा भी है। इसी से ही सुचारु व्यवस्था चल सकती है। इसी रास्ते से सही इंसाफ भी मिल सकता है।
लेकिन, अगर कोई अखबार किसी हमले को कर्म का फल कहने लगे तो डर लगने लगता है। ये ठीक है कि राठौर एक अदालत से दो महीने की सजा पा चुके हैं, लेकिन अभी दूसरी अदालतों में उनका ट्रायल चल रहा है। ऐसे में उनके कर्मों का फल तय करने वाले अखबार वाले कैसे हो सकते हैं? क्या एक तरह ये उकसाने वाली कार्रवाई नहीं है? क्या इससे समाज में गलत संदेश नहीं जा रहा? कल अगर हिन्दुस्तान के संपादक पर कोई गंभीर आरोप लगाता है और फिर उन पर ऐसा ही कुछ होता है तो क्या इसे कर्मों का फल कहना उचित लगेगा उन्हें?
लेकिन, अखबारों में ऐसा अतिरेक पहली बार नहीं हुआ है। एक अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर मुझे आज भी याद है। कटिंग मेरे पास नहीं है इसलिए नाम का उल्लेख नहीं कर रहा। खबर ये थी कि बलात्कार के एक आरोपी की बहन के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कार उस लड़की के भाई ने किया था, जिसके साथ आरोपी ने बलात्कार किया था। ये खबर कुछ इस तरह लिखी गई थी। ऊपर वाले की लाठी जब चलती है तो आवाज नहीं करती है। ये ऊपर वाले का इंसाफ है। ना तो रिपोर्टर ने ना ही संपादक ने इतनी संवेदना समझी कि किसी के भाई ने अगर बलात्कार किया है तो उस बहन का क्या दोष? क्या बलात्कार के बदले बलात्कार ऊपर वाले का न्याय हो सकता है?
जाहिर है ऐसे मामलों में संपादकों को थोड़ा विवेक से काम लेना चाहिए और तठस्थ होकर रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
Saturday, February 6, 2010
हम मुद्दों को ट्विस्ट क्यों करते हैं?
राहुल मुंबई लोकल में घूमे, पटरी से उतरे ठाकरे- द टाइम्स ऑफ इंडिया
राहुल ने ठाकरे की मांद में छापा मारा- हिन्दुस्तान टाइम्स
ठाकरे के गढ़ में बेधड़क घूमे राहुल- हिन्दुस्तान
ये चंद सुर्खियां हैं आज के अखबारों की। इससे पहले न्यूज चैनल काफी कुछ कह चुके हैं। जैसे- राहुल का शिव सेना को ठेंगा। राहुल के आगे टांय-टांय फिस्स हुई शिव सेना आदि, आदि।
सुबह से देर रात तक न्यूज चैनलों पर सिर्फ राहुल छाए थे। टीवी चैनलों पर कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला कह रहे थे राहुल ने अदम्य साहस का परिचय दिया। शिव सेना अलग थलग पड़ गई। ऐसा लग रहा था मानो राहुल के मुंबई ने सारी समस्या हल दी हो। अब वहां उत्तर भारतीयों को कोई समस्या नहीं। राहुल ने शिव सैनिकों को शरमा दिया है। अब वो बिहारियों या यूपी वालों की तरह आंख उठाकर भी नहीं देखेंगे।
सवाल उठता है कि क्या कल की कहानी बस इतनी साधारण सी है? शायद नहीं। राहुल के दौरे से ना तो शिव सेना पस्त हुई है ना ही राहुल या कांग्रेस अपने सिर जीत का सेहरा बांध सकती है। राहुल ने जो कुछ किया वो अति सुरक्षा के दायरे में किया। याद कीजिए आपने ऐसा कब देखा होगा राज्य का मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के एक महासचिव के दौरे के लिए घंटों सड़क पर पुलिस की तरह पहरेदारी करता है? आपने ऐसा कब देखा होगा एक कांग्रेस सांसद की सुरक्षा के लिए मुंबई जैसे महानगर की पूरी पुलिस सड़क पर उतार उतर जाती है? आपने ऐसा कब देखा जब मुंबई के पुलिस कप्तान समेत मुंबई के तमाम आला पुलिस अधिकारी सड़कों पर ट्रैफिक सिपाही की तरह मोर्चा संभाले हुए हैं? जब राज ठाकरे के गुंडे गैरमराठियों को पीट रहे थे, शिव सैनिक उधम मचा रहे थे, तब ऐसा नहीं देखा गया। अगर ऐसा होता तो आज ये समस्या नहीं होती।
लेकिन, बाल ठाकरे के सिर्फ एक बयान ने, कि शिव सैनिक राहुल को काला झंडा दिखाएं, मुंबई की सरकार और पुलिस में हड़कंप मचा दिया है। ऐेसे में अगर राहुल चार घंटे तक मुंबई में सीना तानकर घूमे तो किसने कौन-सा तीर मार लिया। अगर इसके बावजूद शिव सैनिक कुछ कर लेते तो क्या सरकार और पूरी प्रशासन की काबिलियत पर सवाल नहीं उठता? क्या ये साबित नहीं हो जाता कि जो पुलिस मुट्ठी भर शिव सैनिकों को नहीं रोक सकती वो आतंकवाद से कैसे लोहा लेगी? फिर, अब तो ये भी खबरें आ रही हैं कि राहुल का मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर पहले से तय था और इसके लिए पहले से ना दिखने वाला सुरक्षा बंदोबस्त किए गए। यानी कल तक जिसे राहुल का साहस बताया जा रहा था उसकी भी अब पोल खोल गई। जाहिर है, राहुल विजेता बनकर नहीं उभरे हैं। अगर उनमें विजेता बनने की चाहत होती तो वो आम लोगों की तरह मुंबई जाते। आम नहीं तो कम से कम वैसे जैसे से दूसरे शहरों में वो जाते हैं। लेकिन, ना तो राहुल ने ऐसा किया ना ही महाराष्ट्र की सरकार ने। उल्टे महाराष्ट्र की सरकार ने तो साबित कर दिया कि आम लोगों के लिए उनकी सुरक्षा पुख्ता नहीं है। अगर होती तो कम से कम मुख्यमंत्री और पुलिस को कप्तान को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता।
अब बात मीडिया की। क्या राहुल का मुंबई दौरा वाकई इतना अहम था कि उस पर इतना सारा एयर टाइम और न्यूज प्रिंट खर्च किया जाए? क्या राहुल के दौरे से किसी को कुछ हासिल होना था? या क्या किसी को कुछ हासिल हुआ? नहीं। फिर ये बेकार का झमेला क्यों? जाहिर है इससे शिव सेना को ही पब्लिसिटी मिली।
आखिर सवाल, मुंबई में ये संकट कैसे पैदा हुआ? क्या इसके लिए कहीं ना कहीं मीडिया तो दोषी नहीं? पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर गौर करें तो पाएंगे कि शाहरुख का पुतला फूंकने और उनकी फिल्म माइ नेम इज खान का पोस्टर छापने के सिवा मुंबई में कोई गंभीर घटना नहीं हुई है। बस, बाल ठाकरे सामना में गाली गलौज की भाषा में संपादकीय लिखते हैं और बाकी का काम तिल का ताड़ बनाकर न्यूज चैनल कर देता हैं। जरा सोचिये, सामना मुंबई के बाहर कितने लोग पढ़ते हैं। मुंबई में भी सारे लोग उसे नहीं पढ़ते। ऐसे में अगर न्यूज चैनल उसे बार-बार ना दिखाएं तो शायद हालात उतने खराब ना दिखें जितना राष्ट्रीय चैनलों पर बाल ठाकरे का बयान आने के बाद दिखने लगता है। लेकिन, बात इतनी नहीं है। उसके बाद शुरू होता है प्रतिक्रियाओं का दौर। हमारा देश तो ऐसे भी बयानवीरों का देश है। इसमें कौन पीछे हटता है। फिर मामला धीरे-धीरे वाक्युद्ध में तब्दील हो जाता है और बातों की गर्मी का सड़कों पर उतरने का खतरा बन जाता है। मुंबई का ताजा संकट कुछ ऐसा ही है। सामना में सिर्फ बयानबाजी हो रही है और उसी से खौफ का माहौल बन गया। लेकिन, जरा सोचिये अगर हर फालतू बयानों को मीडिया ना उछाले तो क्या ये स्थिति आती? लेकिन, इसमें मीडिया का उल्लू सीधा हो रहा है। पिस रही है तो सिर्फ जनता, जो तमाशा देखने के लिए मजबूर है।
राहुल ने ठाकरे की मांद में छापा मारा- हिन्दुस्तान टाइम्स
ठाकरे के गढ़ में बेधड़क घूमे राहुल- हिन्दुस्तान
ये चंद सुर्खियां हैं आज के अखबारों की। इससे पहले न्यूज चैनल काफी कुछ कह चुके हैं। जैसे- राहुल का शिव सेना को ठेंगा। राहुल के आगे टांय-टांय फिस्स हुई शिव सेना आदि, आदि।सुबह से देर रात तक न्यूज चैनलों पर सिर्फ राहुल छाए थे। टीवी चैनलों पर कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला कह रहे थे राहुल ने अदम्य साहस का परिचय दिया। शिव सेना अलग थलग पड़ गई। ऐसा लग रहा था मानो राहुल के मुंबई ने सारी समस्या हल दी हो। अब वहां उत्तर भारतीयों को कोई समस्या नहीं। राहुल ने शिव सैनिकों को शरमा दिया है। अब वो बिहारियों या यूपी वालों की तरह आंख उठाकर भी नहीं देखेंगे।
सवाल उठता है कि क्या कल की कहानी बस इतनी साधारण सी है? शायद नहीं। राहुल के दौरे से ना तो शिव सेना पस्त हुई है ना ही राहुल या कांग्रेस अपने सिर जीत का सेहरा बांध सकती है। राहुल ने जो कुछ किया वो अति सुरक्षा के दायरे में किया। याद कीजिए आपने ऐसा कब देखा होगा राज्य का मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के एक महासचिव के दौरे के लिए घंटों सड़क पर पुलिस की तरह पहरेदारी करता है? आपने ऐसा कब देखा होगा एक कांग्रेस सांसद की सुरक्षा के लिए मुंबई जैसे महानगर की पूरी पुलिस सड़क पर उतार उतर जाती है? आपने ऐसा कब देखा जब मुंबई के पुलिस कप्तान समेत मुंबई के तमाम आला पुलिस अधिकारी सड़कों पर ट्रैफिक सिपाही की तरह मोर्चा संभाले हुए हैं? जब राज ठाकरे के गुंडे गैरमराठियों को पीट रहे थे, शिव सैनिक उधम मचा रहे थे, तब ऐसा नहीं देखा गया। अगर ऐसा होता तो आज ये समस्या नहीं होती।

लेकिन, बाल ठाकरे के सिर्फ एक बयान ने, कि शिव सैनिक राहुल को काला झंडा दिखाएं, मुंबई की सरकार और पुलिस में हड़कंप मचा दिया है। ऐेसे में अगर राहुल चार घंटे तक मुंबई में सीना तानकर घूमे तो किसने कौन-सा तीर मार लिया। अगर इसके बावजूद शिव सैनिक कुछ कर लेते तो क्या सरकार और पूरी प्रशासन की काबिलियत पर सवाल नहीं उठता? क्या ये साबित नहीं हो जाता कि जो पुलिस मुट्ठी भर शिव सैनिकों को नहीं रोक सकती वो आतंकवाद से कैसे लोहा लेगी? फिर, अब तो ये भी खबरें आ रही हैं कि राहुल का मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर पहले से तय था और इसके लिए पहले से ना दिखने वाला सुरक्षा बंदोबस्त किए गए। यानी कल तक जिसे राहुल का साहस बताया जा रहा था उसकी भी अब पोल खोल गई। जाहिर है, राहुल विजेता बनकर नहीं उभरे हैं। अगर उनमें विजेता बनने की चाहत होती तो वो आम लोगों की तरह मुंबई जाते। आम नहीं तो कम से कम वैसे जैसे से दूसरे शहरों में वो जाते हैं। लेकिन, ना तो राहुल ने ऐसा किया ना ही महाराष्ट्र की सरकार ने। उल्टे महाराष्ट्र की सरकार ने तो साबित कर दिया कि आम लोगों के लिए उनकी सुरक्षा पुख्ता नहीं है। अगर होती तो कम से कम मुख्यमंत्री और पुलिस को कप्तान को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता।
अब बात मीडिया की। क्या राहुल का मुंबई दौरा वाकई इतना अहम था कि उस पर इतना सारा एयर टाइम और न्यूज प्रिंट खर्च किया जाए? क्या राहुल के दौरे से किसी को कुछ हासिल होना था? या क्या किसी को कुछ हासिल हुआ? नहीं। फिर ये बेकार का झमेला क्यों? जाहिर है इससे शिव सेना को ही पब्लिसिटी मिली।
आखिर सवाल, मुंबई में ये संकट कैसे पैदा हुआ? क्या इसके लिए कहीं ना कहीं मीडिया तो दोषी नहीं? पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर गौर करें तो पाएंगे कि शाहरुख का पुतला फूंकने और उनकी फिल्म माइ नेम इज खान का पोस्टर छापने के सिवा मुंबई में कोई गंभीर घटना नहीं हुई है। बस, बाल ठाकरे सामना में गाली गलौज की भाषा में संपादकीय लिखते हैं और बाकी का काम तिल का ताड़ बनाकर न्यूज चैनल कर देता हैं। जरा सोचिये, सामना मुंबई के बाहर कितने लोग पढ़ते हैं। मुंबई में भी सारे लोग उसे नहीं पढ़ते। ऐसे में अगर न्यूज चैनल उसे बार-बार ना दिखाएं तो शायद हालात उतने खराब ना दिखें जितना राष्ट्रीय चैनलों पर बाल ठाकरे का बयान आने के बाद दिखने लगता है। लेकिन, बात इतनी नहीं है। उसके बाद शुरू होता है प्रतिक्रियाओं का दौर। हमारा देश तो ऐसे भी बयानवीरों का देश है। इसमें कौन पीछे हटता है। फिर मामला धीरे-धीरे वाक्युद्ध में तब्दील हो जाता है और बातों की गर्मी का सड़कों पर उतरने का खतरा बन जाता है। मुंबई का ताजा संकट कुछ ऐसा ही है। सामना में सिर्फ बयानबाजी हो रही है और उसी से खौफ का माहौल बन गया। लेकिन, जरा सोचिये अगर हर फालतू बयानों को मीडिया ना उछाले तो क्या ये स्थिति आती? लेकिन, इसमें मीडिया का उल्लू सीधा हो रहा है। पिस रही है तो सिर्फ जनता, जो तमाशा देखने के लिए मजबूर है।
Thursday, February 4, 2010
एक बेटी को कैसे मुंह दिखाओगे गुलजार साहब?

गुलजार पर लगा है चोरी का आरोप। गाने का मुखड़ा चुराने का आरोप। गुलजार एक से बढ़कर एक गीत दे चुके हैं। ऑस्कर तक जीत चुके हैं। उनके गाने जब भी आते हैं खुशनुमा झोंके की तरह संगीतप्रेमियों पर छा जाते हैं। ऐसे में भरोसा नहीं हुआ कि गुलजार जैसा शख्स ऐसा काम कर सकता है। गुलजार पर आरोपों का सामने आना था कि इंटरनेट पर एक-एक कर सच्चाई बाहर आने लगी। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का वो गीत भी सामने आ गया, जो उन्होंने लिखी थी। सर्वेश्वर के गीत और गुलजार के गाने को पढ़कर कोई भी कहेगा कि दोनों में कोई मेल नहीं। लेकिन इसमें भी दो राय नहीं कि गुलजार आरोपों से भाग नहीं सकते। गाने के बोल बेशक अलग हैं, लेकिन गुलजार पूरी तरह से सर्वेश्वर से प्रेरित लगते हैं। ऐसे में नैतिकता का यही तकाजा है कि उन्हें ये मान लेना चाहिए और सर्वेश्वर को भी इसका श्रेय देना चाहिए।
हालांकि गुलजार पर तोहमत लगाने से पहले मैं इस विवाद में उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा था। आज दिल्ली टाइम्स में जब मैंने उनकी प्रतिक्रिया देखी तो रहा नहीं गया और ब्लॉग लिखने बैठ गया। गुलजार साहब फरमाते हैं कि उनके गाने में सिर्फ इब्नतूता समान है। सर्वेश्वर का इब्नतूता जूता पहन के निकलना है, जबकि गुलजार का इब्नतूता जूता बगल में दबा के निकला है। गुलजार कहते हैं कि इब्नतूता शब्द पर तो किसी की कॉपीराइट नहीं हो सकती। ऐसे में वो सर्वेश्वर को क्रेडिट क्यों ना दें?
वाह गुलजार साहब वाह! कम से कम आप के मुंह ये सुनने की तमन्ना नहीं थी। लेकिन आप भी वैसे ही महान निकले, जिन्हें नैतिकता की परवाह नहीं। लोकप्रियता की पिनक में आपको भी लगता है कि आपने जो लिख दिया वो ब्रह्म वाक्य है। नहीं गुलजार साहब, ऐसा नहीं है। इब्नतूता कोई आम शब्द नहीं है। आप ही बताइये अब तक कितने लोगों ने इसे गीत या गाने में इस्तेमाल किया
है? आप गीतकार हैं। ऐसे में ये मानने का तो सवाल ही नहीं होता कि आपने सर्वेश्वर की कविता नहीं पढ़ी होगी। आइडिया की खोज में तो आप लोग इधर--उधर मुंह मारते ही रहते हैं। आपने सर्वेश्वर को जरूर पढ़ा होगा। रही बात जूता पहनने की या बगल में रखने की, क्या फर्क पड़ता है। इब्नतूता है, जूता है। भावना वही है बस बोल अलग हैं। ऐसे में चोरी तो हुई ही ना गुलजार साहब। आप जैसे योग्य गीतकार भला पूरा का पूरा गाना थोड़े ही चुरा सकते हैं?
लेकिन आपने दिल दुखाया है गुलजार साहब। आपको गलती मान लेनी चाहिए। इससे लोगों की नजरों में आपका कद बड़ा ही होता, लेकिन शायद आपको लगा होगा कि बॉलीवुड में आपका कद बड़ा है। आप भला कैसे झुक सकते हैं। चलिये, करोड़ों संगीत प्रेमियों नहीं बल्कि उस बेटी की नजरों से सोचिये, जिसके पिता ने सर्दी की सुबह उसे स्कूल छोड़ते वक्त ये गीत लिखी थी। जी हां,सर्वेश्वर की बेटी शुभा। ये गीत आज भी शुभा की यादों से जुड़ा होगा। क्या वो आपको माफ कर पाएगी? क्या आप उसे मुंह दिखा पाएंगे? लेकिन आपको क्या फर्क पड़ता है। आपतो गुलजार हैं।
हालांकि गुलजार पर तोहमत लगाने से पहले मैं इस विवाद में उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा था। आज दिल्ली टाइम्स में जब मैंने उनकी प्रतिक्रिया देखी तो रहा नहीं गया और ब्लॉग लिखने बैठ गया। गुलजार साहब फरमाते हैं कि उनके गाने में सिर्फ इब्नतूता समान है। सर्वेश्वर का इब्नतूता जूता पहन के निकलना है, जबकि गुलजार का इब्नतूता जूता बगल में दबा के निकला है। गुलजार कहते हैं कि इब्नतूता शब्द पर तो किसी की कॉपीराइट नहीं हो सकती। ऐसे में वो सर्वेश्वर को क्रेडिट क्यों ना दें?
वाह गुलजार साहब वाह! कम से कम आप के मुंह ये सुनने की तमन्ना नहीं थी। लेकिन आप भी वैसे ही महान निकले, जिन्हें नैतिकता की परवाह नहीं। लोकप्रियता की पिनक में आपको भी लगता है कि आपने जो लिख दिया वो ब्रह्म वाक्य है। नहीं गुलजार साहब, ऐसा नहीं है। इब्नतूता कोई आम शब्द नहीं है। आप ही बताइये अब तक कितने लोगों ने इसे गीत या गाने में इस्तेमाल किया
है? आप गीतकार हैं। ऐसे में ये मानने का तो सवाल ही नहीं होता कि आपने सर्वेश्वर की कविता नहीं पढ़ी होगी। आइडिया की खोज में तो आप लोग इधर--उधर मुंह मारते ही रहते हैं। आपने सर्वेश्वर को जरूर पढ़ा होगा। रही बात जूता पहनने की या बगल में रखने की, क्या फर्क पड़ता है। इब्नतूता है, जूता है। भावना वही है बस बोल अलग हैं। ऐसे में चोरी तो हुई ही ना गुलजार साहब। आप जैसे योग्य गीतकार भला पूरा का पूरा गाना थोड़े ही चुरा सकते हैं?लेकिन आपने दिल दुखाया है गुलजार साहब। आपको गलती मान लेनी चाहिए। इससे लोगों की नजरों में आपका कद बड़ा ही होता, लेकिन शायद आपको लगा होगा कि बॉलीवुड में आपका कद बड़ा है। आप भला कैसे झुक सकते हैं। चलिये, करोड़ों संगीत प्रेमियों नहीं बल्कि उस बेटी की नजरों से सोचिये, जिसके पिता ने सर्दी की सुबह उसे स्कूल छोड़ते वक्त ये गीत लिखी थी। जी हां,सर्वेश्वर की बेटी शुभा। ये गीत आज भी शुभा की यादों से जुड़ा होगा। क्या वो आपको माफ कर पाएगी? क्या आप उसे मुंह दिखा पाएंगे? लेकिन आपको क्या फर्क पड़ता है। आपतो गुलजार हैं।
पाठकों के लिए पेश है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता
इब्नबतूता
पहन के जूता
इब्नबतूता
पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
थोड़ी घुस गई कान में
कभी नाक को
कभी कान को
मलते इब्नबतूताट
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते उनका जूता
पहुंच गया जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दूकान में
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
ये है गुलजार का गाना
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्रर
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ जावे चिडिया फुर्रर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
अगले मोड़ पे, मौत खड़ी है
अरे मरने की भी क्या जल्दी है
होर्न बजाके, आवत जनमें
हो दुर्घटना से देर भली है
चल उड़ जा उड़ जा फुर फुर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्रर
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ जावे चिडिया फुर्रर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
अगले मोड़ पे, मौत खड़ी है
अरे मरने की भी क्या जल्दी है
होर्न बजाके, आवत जनमें
हो दुर्घटना से देर भली है
चल उड़ जा उड़ जा फुर फुर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
कौन था इब्नतूता?
गाने में इब्नतूता का जिक्र है। आप सोच रहे होंगे कि ये सिर्फ कवि की कल्पना है या फिर इतिहास में इसका कोई अस्तित्व है। आपको बता दें इब्नतूता एक महान सैलानी थे। इब्ने बतूता का पूरा नाम ‘अबु अब्दुल्ला मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला अल लवाती अल तांजी इब्ने बतूता’ है, जो अपने यात्रा करने के फितूर के लिए मशहूर हैं। 14वीं शताब्दी में जन्मे मोराक्को के इस इस्लामी विद्वान ने 30 साल तक विभिन्न देशों की यात्रा की।
इस घुम्मकड़ ने दुनिया के सारे इस्लामी देशों के अलावा अफ्रीका और यूरोप, भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग 75,000 मील की यात्रा की और इस दौरान उन्होंने कई खतरों का सामना किया और उनका सफर काफी रोमांचकारी रहा। मोरक्को के सुल्तान ने इब्ने बतूता की यात्रा को देखते हुए एक किताब लिखवाई और हम उसका अनुवाद ‘रिहला माई ट्रैवल्स’ आज भी पढ़ सकते हैं।
गाने में इब्नतूता का जिक्र है। आप सोच रहे होंगे कि ये सिर्फ कवि की कल्पना है या फिर इतिहास में इसका कोई अस्तित्व है। आपको बता दें इब्नतूता एक महान सैलानी थे। इब्ने बतूता का पूरा नाम ‘अबु अब्दुल्ला मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला अल लवाती अल तांजी इब्ने बतूता’ है, जो अपने यात्रा करने के फितूर के लिए मशहूर हैं। 14वीं शताब्दी में जन्मे मोराक्को के इस इस्लामी विद्वान ने 30 साल तक विभिन्न देशों की यात्रा की।
इस घुम्मकड़ ने दुनिया के सारे इस्लामी देशों के अलावा अफ्रीका और यूरोप, भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग 75,000 मील की यात्रा की और इस दौरान उन्होंने कई खतरों का सामना किया और उनका सफर काफी रोमांचकारी रहा। मोरक्को के सुल्तान ने इब्ने बतूता की यात्रा को देखते हुए एक किताब लिखवाई और हम उसका अनुवाद ‘रिहला माई ट्रैवल्स’ आज भी पढ़ सकते हैं।
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Wednesday, February 3, 2010
आशुतोष के बहाने
पिछले दिनों आईबीएन7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष रण फिल्म देखकर निकले। महोदय इतने सम्मोहित थे कि उन्हें फिल्म में आईना दिख गया। हंसी आ गई पढ़ कर। क्या महाराज, आपको इतना बड़ा पत्रकार मान रहा था और आपको आईना देखने के लिए फिल्म देखने की जरुरत पड़ गई। कैसे पत्रकार हैं आप? हर रोज जो इतने ब्लॉग्स और पोर्टल में आईना दिखाया जा रहा था वो नहीं देखते थे? नेता हों या आम लोग हर रोज जो इलैक्ट्रानिक मीडिया के कामकाज पर प्रवचन देते थे, उसे नहीं सुनते थे क्या आशुतोषजी? धन्य हैं महाराज आप। चलिए कम से कम रण के रूप में आपको बोधिवृक्ष तो मिला। आपके ज्ञान चक्षु तो खुले। अब कहिये। कहां जाएंगे आप? बुद्ध की तरह घर (न्यूज रूम) छोड़ ज्ञान की खोज में निकलेंगे?
दरअसल इन दिनों बुद्धिजीवी दिखने का नया दौर चल पड़ा है। इलैक्ट्रानिक मीडिया को गरियाने का दौर। जो जितना गरिया सकता है वो उतना बड़ा बुद्धिजीवी। जो लोग इस मीडिया के हिस्से हैं वो भी गरिया रहे हैं और इस बहती गंगा में वो भी डुबकी लगा रहे हैं जो न्यूज चैनलों के दफ्तर के आसपास भी फटक नहीं पाए। ब्लॉग्स, मीडिया की खबरें देने वाले पोर्टल ऐसे लेखों से भरे पड़े हैं, जिसमें किसी ना किसी वजह से न्यूज चैनलों को पानी पी-पीकर गाली दी गई हो। मुद्दा चाहे कंटेंट का हो या फिर काम के माहौल का। इलेक्ट्रानिक मीडिया के हिस्से तारीफ ना के बराबर मिल रही है।
बेशक, इसके पीछे न्यूज़ चैनल जिम्मेदार हैं। वो अपना बचाव अपने काम से नहीं कर पा रहे, बल्कि वो भी आलोचनाओं के आगे नतमस्तक होकर आत्म चिंतन की जगह खुद की आलोचना करने में लग गए हैं। एनडीटीवी के रवीश कुमार, न्यूज24 के अजीत अंजुम, आईबीएन7 के आशुतोष इसकी मिसाल हैं। मैं पूछना चाहता हूं इन महामहिमों से आखिर वो कौन-सी नजीर पेश करना चाहते हैं। ये तीनों अपने-अपने चैनलों में इस पोजीशन में हैं, जहां से चैनल को ड्राइव कर सकें। इनकी नजर में जो कमजोरी है वो दूर कर सकें। फिर ये ब्लॉग्स और लेखों के जरिये किस बात का रोना रो रहे हैं। क्या वो अपने विचारों से उन मझोले और निचले (पद में) स्तर के पत्रकारों में कुंठा और भटकाव पैदा नहीं कर रहे? ये इनके विचारों से ये ध्वनि नहीं निकल रही कि हम हारे हुए लोग हैं।
अगर रवीश, आशुतोष और अंजुम जैसों को लगता है कि वो कुछ नहीं कर सकते हैं तो फिर मोटी सैलरी पर कुंडली मार कर क्यों बैठे हुए हैं? अगर गिरेबां में झांकने की इतनी ईमानदारी और हिम्मत है तो क्यों नहीं टेलीविजन से वनवास ले लेते? शायद ये खुद को गरियाकर लोगों के बीच ईमानदार दिखते रहना चाहते हैं ताकि अपना एजेंडा भी बना रहे और ईमानदार पत्रकार का लेबल भी बना रहे। ऐसा नहीं चलेगा भाई साब।
ये आप ही जैसों की करनी है कि आज हर कोई न्यूज चैनलों को गाली देने लगा है। लोगों की हिमाकत इतनी बढ़ गई है कि अब वो न्यूज चैनलों के अंदर के काम के माहौल पर भी उंगली उठाने लगे हैं। जिन लोगों को न्यूज रूम में घुसने की भी हिम्मत नहीं होगी वो इसे रंडीबाजी (भंडास में एक लेख) का पेशा तक कहने लगे हैं। आखिर ये हिम्मत कहां से आई? जनाब ये हिम्मत आप लोगों ने ही दी है। आप नाकाम हो चुके हैं। आपके विचार कुम्हला चुके हैं। रवीश ने जिस गोबर के ढेर का जिक्र किया था, आपके विचारों से गोबर की बदबू आने लगी है। अच्छा हो आप लोग यहां से कट लीजिए। नए लोगों के लिए रास्ता खाली कीजिए ताकि ताजे विचारों की धार बनी रहे।
दरअसल इन दिनों बुद्धिजीवी दिखने का नया दौर चल पड़ा है। इलैक्ट्रानिक मीडिया को गरियाने का दौर। जो जितना गरिया सकता है वो उतना बड़ा बुद्धिजीवी। जो लोग इस मीडिया के हिस्से हैं वो भी गरिया रहे हैं और इस बहती गंगा में वो भी डुबकी लगा रहे हैं जो न्यूज चैनलों के दफ्तर के आसपास भी फटक नहीं पाए। ब्लॉग्स, मीडिया की खबरें देने वाले पोर्टल ऐसे लेखों से भरे पड़े हैं, जिसमें किसी ना किसी वजह से न्यूज चैनलों को पानी पी-पीकर गाली दी गई हो। मुद्दा चाहे कंटेंट का हो या फिर काम के माहौल का। इलेक्ट्रानिक मीडिया के हिस्से तारीफ ना के बराबर मिल रही है।
बेशक, इसके पीछे न्यूज़ चैनल जिम्मेदार हैं। वो अपना बचाव अपने काम से नहीं कर पा रहे, बल्कि वो भी आलोचनाओं के आगे नतमस्तक होकर आत्म चिंतन की जगह खुद की आलोचना करने में लग गए हैं। एनडीटीवी के रवीश कुमार, न्यूज24 के अजीत अंजुम, आईबीएन7 के आशुतोष इसकी मिसाल हैं। मैं पूछना चाहता हूं इन महामहिमों से आखिर वो कौन-सी नजीर पेश करना चाहते हैं। ये तीनों अपने-अपने चैनलों में इस पोजीशन में हैं, जहां से चैनल को ड्राइव कर सकें। इनकी नजर में जो कमजोरी है वो दूर कर सकें। फिर ये ब्लॉग्स और लेखों के जरिये किस बात का रोना रो रहे हैं। क्या वो अपने विचारों से उन मझोले और निचले (पद में) स्तर के पत्रकारों में कुंठा और भटकाव पैदा नहीं कर रहे? ये इनके विचारों से ये ध्वनि नहीं निकल रही कि हम हारे हुए लोग हैं।
अगर रवीश, आशुतोष और अंजुम जैसों को लगता है कि वो कुछ नहीं कर सकते हैं तो फिर मोटी सैलरी पर कुंडली मार कर क्यों बैठे हुए हैं? अगर गिरेबां में झांकने की इतनी ईमानदारी और हिम्मत है तो क्यों नहीं टेलीविजन से वनवास ले लेते? शायद ये खुद को गरियाकर लोगों के बीच ईमानदार दिखते रहना चाहते हैं ताकि अपना एजेंडा भी बना रहे और ईमानदार पत्रकार का लेबल भी बना रहे। ऐसा नहीं चलेगा भाई साब।
ये आप ही जैसों की करनी है कि आज हर कोई न्यूज चैनलों को गाली देने लगा है। लोगों की हिमाकत इतनी बढ़ गई है कि अब वो न्यूज चैनलों के अंदर के काम के माहौल पर भी उंगली उठाने लगे हैं। जिन लोगों को न्यूज रूम में घुसने की भी हिम्मत नहीं होगी वो इसे रंडीबाजी (भंडास में एक लेख) का पेशा तक कहने लगे हैं। आखिर ये हिम्मत कहां से आई? जनाब ये हिम्मत आप लोगों ने ही दी है। आप नाकाम हो चुके हैं। आपके विचार कुम्हला चुके हैं। रवीश ने जिस गोबर के ढेर का जिक्र किया था, आपके विचारों से गोबर की बदबू आने लगी है। अच्छा हो आप लोग यहां से कट लीजिए। नए लोगों के लिए रास्ता खाली कीजिए ताकि ताजे विचारों की धार बनी रहे।
Sunday, January 31, 2010
टेलीविजन का 'अब क्यों' सिंड्रोम

सुबह स्टार न्यूज पर बहस गर्मागर्म थी। नोएडा ऑथरिटी ने अवैध मोबाइल टावरों को सील करना शुरू कर दिया है। लोग परेशान हैं। रिपोर्टर ऑन स्पॉट उन लोगों के साथ खड़े थे, जिनकी जिंदगी मोबाइल नेटवर्क की तरह जाम हो गई थी। नोएडा के एडिशनल सीईओ पीएन बॉथम से फोन पर संपर्क साधा गया। बाथम ने प्रशासन का पक्ष रखा। कार्रवाई का बचाव किया। कहा-ये टॉवर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए, बगैर इजाजत अवैध तरीके से रिहाइशी इलाकों में खड़े किए गए थे, इसलिए इन पर कार्रवाई जायज है।
यहां तक को सब ठीक चल रहा था, लेकिन इसके बाद एंकर और नोएडा ऑथरिटी के एडीशनल सीईओ के बीच जो बातें हुईं उसने एक बार फिर आज की सतही पत्रकारिता को नंगा कर दिया। बॉथम से एंकर सुमैरा खान पूछती हैं कि ये टॉवर पांच साल से लग रहे थे, तो कार्रवाई अब क्यों? बॉथम का जवाब था मोबाइल ऑपरेटरों को नोटिस भेजे गए थे। टॉवर धीरे-धीरे लग रहे थे। अब चूंकि समस्या गंभीर हुई है इसलिए कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन एंकर का सवाल बार-बार 'अब क्यों' पर अटका हुआ था।
मीडिया का ये 'अब क्यों' बहुत दिलचस्प सवाल है। अब क्यों? उस वक्त क्यों नहीं? स्टार न्यूज से पूछा जाना चाहिए क्या प्रशासन ने उस वक्त अगर थोड़ी लापरवाही बरती तो इसका मतलब क्या है अब कार्रवाई का हक नहीं बनता? मंत्रियों और अधिकारियों के एक-एक बयान की नुक्तानीची करने वाले मीडिया वालों को क्या इस वक्त नोएडा ऑथरिटी के साथ नहीं होना चाहिए जो देर से ही सही, एक जायज कार्रवाई के लिए सामने आया है?
ये बात हर कोई जानता है कि जब कोई नई चीज सामने आती है तो वो लोगों को सुविधाएं देता है तो पहले हम उसके दूसरे बुरे असर की अनदेखी करते हैं। मोबाइल के साथ भी ऐसा ही है। हर किसी की जिंदगी मोबाइल नेटवर्क से जुड़ गई है आज। ऐसे में मोबाइल कंपनियां बेहतर नेटवर्क के लिए धड़ाधड़ टॉवर लगा रही हैं। और ये टॉवर भी आम लोगों की छतों पर लग रहे हैं, जिन्होंने चंद कमाई के लिए खुद ही सुरक्षा मानकों से आंख मूंद रखा है।
ये मीडिया ही है जो लगातार इन खबरों को उछालता रहा है कि रिहाइशी बस्तियों में लगे मोबाइल टॉवर इंसानी सेहत के लिए खतरनाक हैं। चलिए, देर से ही सही कहीं से कोई कार्रवाई तो शुरू हुई है। ऐसे में इस कार्रवाई के पीछे खड़े होने की बजाय अगर मीडिया इसका साथ दे तो ज्यादा सही होगा। बेशक सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन उन लोगों से जिनकी छतों पर टॉवर लगे हैं। उनसे पूछना चाहिए क्या उन्हें इससे चिंता नहीं होती? टॉवर के आसपास रहने वालों को इससे पैदा होने वाले खतरों को बता कर पूछना चाहिए कि क्या मोबाइल नेटवर्क के लिए वो अपनी सेहत से समझौता कर सकते हैं? जो लोग मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने से परेशान हैं, उनसे पूछना चाहिए कि सिर्फ नेटवर्क से कनेक्ट रहने के लिए वो कितनी कीमत चुका सकते हैं? क्या वो इसके लिए अपने और अपने संतानों की सेहत दांव पर लगा सकते हैं? स्थानीय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि जब इतना बड़ा टॉवर खड़ा हो रहा था तो क्या उनकी आंखों पर पट्टी लगी थी?
बॉथम से उनके इस बयान पर, कि अगर मोबाइल ऑपरेटर अंडरटेकिंग दे दें तो आज ही सील तोड़ लिया जाएगा, पूछा जाना चाहिए कि क्या सिर्फ अंडरटेकिंग देने से सब ठीक हो जाएगा?
लेकिन, नहीं। मीडिया को सिर्फ 'अब क्यों?' का जवाब चाहिए क्योंकि इससे अच्छी हेडलाइन्स बन सकती है। नकारात्मक चीजें ऐसे भी लोगों की खींचती हैं। पता नहीं, कब इस प्रवृत्ति का अंत होगा।
नोट : इस खबर के दौरान स्टार न्यूज पर एक पीली पट्टी चल रही थी। अगर आपके इलाके में नेटवर्क खराब है तो स्टार न्यूज को फोन करें। दर्शकों के फोन मंगाने में हमेशा उत्सुक रहने वाला स्टार न्यूज भूल गया कि जिनका नेटवर्क खराब है वो भला कैसे फोन करेंगे और अगर कोई फोन करता है तो फिर नेटवर्क कैसे खराब हुआ।
यहां तक को सब ठीक चल रहा था, लेकिन इसके बाद एंकर और नोएडा ऑथरिटी के एडीशनल सीईओ के बीच जो बातें हुईं उसने एक बार फिर आज की सतही पत्रकारिता को नंगा कर दिया। बॉथम से एंकर सुमैरा खान पूछती हैं कि ये टॉवर पांच साल से लग रहे थे, तो कार्रवाई अब क्यों? बॉथम का जवाब था मोबाइल ऑपरेटरों को नोटिस भेजे गए थे। टॉवर धीरे-धीरे लग रहे थे। अब चूंकि समस्या गंभीर हुई है इसलिए कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन एंकर का सवाल बार-बार 'अब क्यों' पर अटका हुआ था।
मीडिया का ये 'अब क्यों' बहुत दिलचस्प सवाल है। अब क्यों? उस वक्त क्यों नहीं? स्टार न्यूज से पूछा जाना चाहिए क्या प्रशासन ने उस वक्त अगर थोड़ी लापरवाही बरती तो इसका मतलब क्या है अब कार्रवाई का हक नहीं बनता? मंत्रियों और अधिकारियों के एक-एक बयान की नुक्तानीची करने वाले मीडिया वालों को क्या इस वक्त नोएडा ऑथरिटी के साथ नहीं होना चाहिए जो देर से ही सही, एक जायज कार्रवाई के लिए सामने आया है?
ये बात हर कोई जानता है कि जब कोई नई चीज सामने आती है तो वो लोगों को सुविधाएं देता है तो पहले हम उसके दूसरे बुरे असर की अनदेखी करते हैं। मोबाइल के साथ भी ऐसा ही है। हर किसी की जिंदगी मोबाइल नेटवर्क से जुड़ गई है आज। ऐसे में मोबाइल कंपनियां बेहतर नेटवर्क के लिए धड़ाधड़ टॉवर लगा रही हैं। और ये टॉवर भी आम लोगों की छतों पर लग रहे हैं, जिन्होंने चंद कमाई के लिए खुद ही सुरक्षा मानकों से आंख मूंद रखा है।
ये मीडिया ही है जो लगातार इन खबरों को उछालता रहा है कि रिहाइशी बस्तियों में लगे मोबाइल टॉवर इंसानी सेहत के लिए खतरनाक हैं। चलिए, देर से ही सही कहीं से कोई कार्रवाई तो शुरू हुई है। ऐसे में इस कार्रवाई के पीछे खड़े होने की बजाय अगर मीडिया इसका साथ दे तो ज्यादा सही होगा। बेशक सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन उन लोगों से जिनकी छतों पर टॉवर लगे हैं। उनसे पूछना चाहिए क्या उन्हें इससे चिंता नहीं होती? टॉवर के आसपास रहने वालों को इससे पैदा होने वाले खतरों को बता कर पूछना चाहिए कि क्या मोबाइल नेटवर्क के लिए वो अपनी सेहत से समझौता कर सकते हैं? जो लोग मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने से परेशान हैं, उनसे पूछना चाहिए कि सिर्फ नेटवर्क से कनेक्ट रहने के लिए वो कितनी कीमत चुका सकते हैं? क्या वो इसके लिए अपने और अपने संतानों की सेहत दांव पर लगा सकते हैं? स्थानीय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि जब इतना बड़ा टॉवर खड़ा हो रहा था तो क्या उनकी आंखों पर पट्टी लगी थी?
बॉथम से उनके इस बयान पर, कि अगर मोबाइल ऑपरेटर अंडरटेकिंग दे दें तो आज ही सील तोड़ लिया जाएगा, पूछा जाना चाहिए कि क्या सिर्फ अंडरटेकिंग देने से सब ठीक हो जाएगा?
लेकिन, नहीं। मीडिया को सिर्फ 'अब क्यों?' का जवाब चाहिए क्योंकि इससे अच्छी हेडलाइन्स बन सकती है। नकारात्मक चीजें ऐसे भी लोगों की खींचती हैं। पता नहीं, कब इस प्रवृत्ति का अंत होगा।
नोट : इस खबर के दौरान स्टार न्यूज पर एक पीली पट्टी चल रही थी। अगर आपके इलाके में नेटवर्क खराब है तो स्टार न्यूज को फोन करें। दर्शकों के फोन मंगाने में हमेशा उत्सुक रहने वाला स्टार न्यूज भूल गया कि जिनका नेटवर्क खराब है वो भला कैसे फोन करेंगे और अगर कोई फोन करता है तो फिर नेटवर्क कैसे खराब हुआ।
Saturday, January 23, 2010
सहवाग से ज्यादा बड़बोले टीवी वाले

भारतीय क्रिकेट टीम चटगांव टेस्ट सौ से ज्यादा रनों से जीत गई, लेकिन टीवी वालों के चेहरे पर खुशी नहीं थी। पहला मौका था जब न्यूज चैनल टीम इंडिया की जीत का जश्न नहीं मना रहे थे। वजह- न्यूज चैनलों का एजेंडा पिट गया था। टेस्ट के पहले दिन से चैनल वाले सहवाग के बड़बोलेपन का जो ढोल पीट रहे थे, टेस्ट के आखिरी दिन टीम इंडिया ने उन्हीं की ढोल बजा दी। मैं पूछना चाहता हूं देश के खेल संपादकों से कि आखिर सहवाग का कसूर क्या था संपादक साहब?
चटगांव टेस्ट में नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जगह टीम की कप्तानी करने वाले वीरेंद्र सहवाग ने टेस्ट की पूर्वसंध्या पर कहा था बांग्लादेश साधारण टीम है। वो टेस्ट में हमारे बीस विकेट नहीं निकाल सकती। टेस्ट के पहले रोज 200 रनों से पहले बांग्लादेश ने टीम इंडिया के आठ विकेट निकाल लिए। बस न्यूज चैनलों को कैसे मौका मिल गया। बड़बोले वीरू, कहां गई हेकड़ी जैसे शीर्षक चैनलों पर चलने लगे। हर बड़ा और अदना खेल पत्रकार (सिर्फ टीवी वाले) सहवाग की खिंचाई करने लगा। ऐसा लग रहा था कि मानो हम इंडियन नहीं बल्कि बांग्लादेश का चैनल देख रहे हों। ऐसा लग रहा था कि मानो सहवाग ने कोई गलत बात कह दी हो। मानो सहवाग ने बांग्लादेश को गाली दे दी हो। अरे संपादक महोदय, टेस्ट मैच पांच दिनों का होता है। हर रोज तीन सेशन होते हैं, यानि पंद्रह सेशन। पहले दिन तीन सेशन में खराब खेल का मतलब ये नहीं होता कि दूसरी टीम ने बाजी मार ली। आप रिपोर्टिंग करते वक्त क्रिकेट का बुनियादी वसूल क्यों भूल जाते हैं?
अंततः हुआ भी वही। आखिरी दिन लंच से पहले ही पिट गया बांग्लादेश। अब आप बताइये सहवाग की बात सही साबित हई या नहीं? आप बताइये सहवाग ने क्या गलत कहा था। वीरू ने कहा बांग्लादेश हमारे बीस विेकेट नहीं ले सकता। भारत ने दूसरी पारी चार सौ से ज्यादा रन बनाकर घोषित कर दी और सहवाग की बात सही साबित हुई। लेकिन, विंडबना देखिये। सहवाग की शाबाशी देने की बजाय न्यूज चैनलों को ये जीत फीकी नजर आने लगी। किसी ने स्लेजिंग वाला मसला उठाया तो किसी ने ये बकवास की कि बांग्लादेश पर सौ रनों की जीत कोई जीत है। अरे नासमझो, क्रिकेट में जीत का मतलब जीत होता है। रिकार्डबुक ये दर्ज नहीं होता कि आपने कितना संघर्ष किया, रिकार्ड बुक से ये मतलब होता है आप जीते या हारे। ये सिर्फ क्रिकेट की बात नहीं, ये आम जिंदगी की बात है। चुनाव को ही लीजिए। उम्मीदवार एक वोट से चुनाव जीते या पांच लाख वोटों से दोनों ही सूरत में पांच साल तक ही वो सांसद या विधायक रह सकता। उसी तरह, पढ़ाई का मामला लीजिए। आप कितने पढ़े लिखे हैं इसका फैसला इम्तिहान के नतीजे से होता है। आपको नौकरी मिलेगी या नहीं ये उसके इम्तिहान के नतीजों से तय होगा। तो वही बात क्रिकेट के मैदान में है। भारत ने मैच जीत लिया। आखिरी सच्चाई यही है। लेकिन क्या करें अपने खेल संपादकों का। उन्हें तो बस कुतर्क करना है।
चटगांव टेस्ट में नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जगह टीम की कप्तानी करने वाले वीरेंद्र सहवाग ने टेस्ट की पूर्वसंध्या पर कहा था बांग्लादेश साधारण टीम है। वो टेस्ट में हमारे बीस विकेट नहीं निकाल सकती। टेस्ट के पहले रोज 200 रनों से पहले बांग्लादेश ने टीम इंडिया के आठ विकेट निकाल लिए। बस न्यूज चैनलों को कैसे मौका मिल गया। बड़बोले वीरू, कहां गई हेकड़ी जैसे शीर्षक चैनलों पर चलने लगे। हर बड़ा और अदना खेल पत्रकार (सिर्फ टीवी वाले) सहवाग की खिंचाई करने लगा। ऐसा लग रहा था कि मानो हम इंडियन नहीं बल्कि बांग्लादेश का चैनल देख रहे हों। ऐसा लग रहा था कि मानो सहवाग ने कोई गलत बात कह दी हो। मानो सहवाग ने बांग्लादेश को गाली दे दी हो। अरे संपादक महोदय, टेस्ट मैच पांच दिनों का होता है। हर रोज तीन सेशन होते हैं, यानि पंद्रह सेशन। पहले दिन तीन सेशन में खराब खेल का मतलब ये नहीं होता कि दूसरी टीम ने बाजी मार ली। आप रिपोर्टिंग करते वक्त क्रिकेट का बुनियादी वसूल क्यों भूल जाते हैं?
अंततः हुआ भी वही। आखिरी दिन लंच से पहले ही पिट गया बांग्लादेश। अब आप बताइये सहवाग की बात सही साबित हई या नहीं? आप बताइये सहवाग ने क्या गलत कहा था। वीरू ने कहा बांग्लादेश हमारे बीस विेकेट नहीं ले सकता। भारत ने दूसरी पारी चार सौ से ज्यादा रन बनाकर घोषित कर दी और सहवाग की बात सही साबित हुई। लेकिन, विंडबना देखिये। सहवाग की शाबाशी देने की बजाय न्यूज चैनलों को ये जीत फीकी नजर आने लगी। किसी ने स्लेजिंग वाला मसला उठाया तो किसी ने ये बकवास की कि बांग्लादेश पर सौ रनों की जीत कोई जीत है। अरे नासमझो, क्रिकेट में जीत का मतलब जीत होता है। रिकार्डबुक ये दर्ज नहीं होता कि आपने कितना संघर्ष किया, रिकार्ड बुक से ये मतलब होता है आप जीते या हारे। ये सिर्फ क्रिकेट की बात नहीं, ये आम जिंदगी की बात है। चुनाव को ही लीजिए। उम्मीदवार एक वोट से चुनाव जीते या पांच लाख वोटों से दोनों ही सूरत में पांच साल तक ही वो सांसद या विधायक रह सकता। उसी तरह, पढ़ाई का मामला लीजिए। आप कितने पढ़े लिखे हैं इसका फैसला इम्तिहान के नतीजे से होता है। आपको नौकरी मिलेगी या नहीं ये उसके इम्तिहान के नतीजों से तय होगा। तो वही बात क्रिकेट के मैदान में है। भारत ने मैच जीत लिया। आखिरी सच्चाई यही है। लेकिन क्या करें अपने खेल संपादकों का। उन्हें तो बस कुतर्क करना है।
मुझे कहना है

जिंदगी में हर रोज ऐसा कुछ ना कुछ होता है कि आपको उस पर कुछ कहने को जी चाहता है। क्रिकेट में जीत गए तो आपका जी मचलने लगता है कुछ कहने को। दिनभर बिजली नहीं आई। आपके अंदर कुलबुलाहट मचने लगते हैं भंडास निकालने को। कोई चौक-चौराहे पर अपने मन का गुबार निकालता है, तो कोई अपने घर में। जिनके पास कलम है, जिनके पास किसी न्यूज़ चैनल का मंच है वो वहां मन का गुबार निकालते हैं। चूंकि उनकी पहुंच ज्यादा लोगों तक है इसलिए उनके कहे को सुनना पड़ता है। चाहे वो गलत ही क्यों ना बोलें। चाहे वो तर्क की जगह कुतर्क ही क्यों ना करें। उनकी बात सुनी जाती है। हालांकि, अक्सर उनकी बात सुनने के बाद लोग गरियाते ही हैं।
मेरे अंदर भी अक्सर ऐसी अकुलाहट होती है मीडिया में प्रकाशित, प्रसारित चीजों को लेकर। कई बार या कहें अक्सर मुझे लगता है कि मीडिया ने तर्क की जगह कुतर्क का सहारा लिया। मीडिया ने अपना एजेंडा चलाने की कोशिश की। खबर को बेचने के लिए मीडिया ने बिना वजह घटना को रंग देने की कोशिश की। लेकिन, कभी मैं कोई पत्रकार नहीं। किसी मीडिया संस्थान तक मेरी पहुंच नहीं। मैं कोई नेता नहीं। ना ही मेरा कोई मंच है। मैं एक पाठक हूं। एक समर्पित दर्शक हूं। लिहाजा मुझे लगा कि मुझे अपनी बात रखनी चाहिए। चूंकि शिकायती पत्र अक्सर अखबार वाले रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं। टीवी में फीडबैक की गुंजाइश नहीं। ऐेसे में मैंने सोचा क्यों ना मैं भी ब्लॉगिंग शुरू कर दूं। जब अमिताभ बच्चन ब्लॉग के लिए समय निकाल सकते हैं तो मैं क्यों नहीं। तो आज मैंने भी बना डाला अपना ब्लॉग। नाम है रिपोर्टर, जो हर रिपोर्टर की रिपोर्ट करेगा।
मेरे अंदर भी अक्सर ऐसी अकुलाहट होती है मीडिया में प्रकाशित, प्रसारित चीजों को लेकर। कई बार या कहें अक्सर मुझे लगता है कि मीडिया ने तर्क की जगह कुतर्क का सहारा लिया। मीडिया ने अपना एजेंडा चलाने की कोशिश की। खबर को बेचने के लिए मीडिया ने बिना वजह घटना को रंग देने की कोशिश की। लेकिन, कभी मैं कोई पत्रकार नहीं। किसी मीडिया संस्थान तक मेरी पहुंच नहीं। मैं कोई नेता नहीं। ना ही मेरा कोई मंच है। मैं एक पाठक हूं। एक समर्पित दर्शक हूं। लिहाजा मुझे लगा कि मुझे अपनी बात रखनी चाहिए। चूंकि शिकायती पत्र अक्सर अखबार वाले रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं। टीवी में फीडबैक की गुंजाइश नहीं। ऐेसे में मैंने सोचा क्यों ना मैं भी ब्लॉगिंग शुरू कर दूं। जब अमिताभ बच्चन ब्लॉग के लिए समय निकाल सकते हैं तो मैं क्यों नहीं। तो आज मैंने भी बना डाला अपना ब्लॉग। नाम है रिपोर्टर, जो हर रिपोर्टर की रिपोर्ट करेगा।
प्रस्तावना
जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं, तो मुझे भी कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो दूसरे नहीं कहते। जो टीवी नहीं करता। अखबार नहीं लिखते।
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