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पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Saturday, January 14, 2012

टीम इंडिया हार रही है या ऑस्ट्रेलिया जीत रहा है?

देश में मातम मचा है। जिन सितारों को कुछ दिन पहले तक लोग सिर आंखों पर बिठाए इठलाए घूम रहे थे, उन्हें जमीन पर पटक दिया गया है। ऑस्ट्रेलिया में हो रही टीम इंडिया की फजीहत से फैन्स तो फैन्स समीक्षक भी झल्लाए बैठे हैं। हालत ये हो चुकी है अब लोग सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ जैसे खिलाड़ियों को तकनीक दुरुस्त करने की सीख देने लगे हैं।
क्या आपको लगता है राहुल द्रविड़ को कोई खेलना सिखा सकता है? क्या आज की तारीख में सचिन तेंदुलकर को ये बताया जा सकता है कि ऐसे नहीं वैसे खेलो? लेकिन, आज ऐसा ही हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया में हो रही दुर्गति ने टीम इंडिया को खिलाड़ियों को छोड़कर हर किसी को क्रिकेट का पंडित बना दिया है।
मैं यहां कुछ गंभीर सवालों पर चर्चा करना चाहता हूं। क्या भारत की हार के लिए घटिया बल्लेबाजी कसूरवार है? क्या भारतीय गेंदबाजों को खराब गेंदबाजी के लिए बख्शा जा सकता है? क्या भारतीय हार का श्रेय ऑस्ट्रेलिया के शानदार खेल को देना हमारी शान में गुस्ताखी होगी? क्या हम ये मानने की विनम्रता नहीं दिखा सकते कि कंगारुओं ने बेहतर प्रदर्शन दिखाया?
इसमें दो राय नहीं कि कागज पर भारत का बैटिंग लाइन अप किसी भी टीम के मुकाबले कई गुणा मजबूत है। जिस टीम में सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण जैसे बल्लेबाज हों उसकी मजबूती की कल्पना कर सकते हैं। लेकिन क्या इन खिलाड़ियों के रहने भर से आप आश्वस्त हो सकते हैं कि भारत हर मैच में पांच सौ रन स्कोर बोर्ड पर टांग दे। ये मत भूलिये कि क्रिकेट में हर बल्लेबाज को शून्य से ही पारी की शुरुआत करनी होती है और किसी बल्लेबाज को आउट करने के लिए सिर्फ एक गेंद काफी होती है। अब देखिये ऑस्ट्रेलिया में हो क्या रहा है। ज्यादातर कंगारू गेंदबाज सटीक लाइन लेंग्थ पर गेंदबाजी कर रहे हैं। बल्लेबाजों को पसंद का शॉट्स खेलने के लिए रूम नहीं मिल रहा। उस पर कसी हुई फील्डिंग। आधा मौका भी दिया नहीं कि उसे लपकने के लिए तैयार हैं कंगारू। ऐसे में किसी भी खिलाड़ी का आउट होना लाजिमी है। पूरी सीरीज में सचिन या द्रविड़ के डिसमिसल को देख लीजिए। किसी ने विकेट नहीं फेका है बल्कि अच्छी गेंदों पर आउट हुए हैं। सिडनी में लक्ष्मण जिस गेंद पर आउट हुए उस पर दूसरा को भी बल्लेबाज अपनी किस्मत से ही बचता।
बेशक, टीवी पर मैच देखने से लगता है इस गेंद को ऐसे खेलना चाहिए था, उस गेंद को वैसे खेलना चाहिए था लेकिन मैदान का तनाव कुछ और होता है। जब पिच में जान हो और गेंदबाजी धारदार हो तो बल्लेबाज हर वक्त संदेह की स्थिति में होता है। गेंद को छोड़ें या रोकें या ड्राइव करें। हर बॉल को जज करना मुश्किल होता है और इसी में विकेट जाता है। पर्थ में माइकल क्लार्क, रिकी पॉन्टिंग और माइकल हसी इसकी मिसाल हैं। तीनों खिलाड़ी सिडनी से शानदार शतक बनाकर यहां पहुंचे थे लेकिन पर्थ में फिसड्डी साबित हुए। मेरे कहने का मतलब साफ है कंगारू गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजों को छूट नहीं दी और उसी का नतीजा है ये पतन।
अब बात गेंदबाजों की। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, वेस्टइंडीज.. इन देशों में कभी भी टीम इंडिया के फैन्स अपने बल्लेबाजों से रनों के अंबार की उम्मीद नहीं करते क्योंकि पिछले कुछ अपवादों को छोड़कर यहां हमेशा से उनका रिकार्ड खराब रहा है। लेकिन, वहां के अनुकूल वातावरण में तेज गेंदबाजों से हमेशा अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है। लेकिन, भारतीय गेंदबाजों ने क्या किया? सिडनी में सिर्फ चार विकेट ले पाए। पर्थ में 22 ओवरों में ही मैच ऑस्ट्रेलिया की झोली में डाल दिया। मेलबर्न में पुछल्ले बल्लेबाजों को आउट नहीं कर पाए। भारत के गेंदबाज कभी भी लगातार अच्छी गेंदबाजी नहीं कर पाए, जिससे ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बेफिक्र होकर बल्लेबाजी करते रहे और उन पर कभी दबाव नहीं बन पाया। मेरे ख्याल से ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज में गेंदबाजों को कमान संभालना चाहिए था जिसमें वो नाकाम रहे और टीम इंडिया की नाकामी की सबसे बड़ी वजह यही है।

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