About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Saturday, May 16, 2015

ये मीडिया गैरजिम्मेदार है

आखिरकार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के हेडकांस्टेबल सतीश चंद्र को जमानत मिल गई। मुमकिन है कि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद महिला को ईंट से मारने के आरोपों से वो बरी हो जाएं और उनकी नौकरी भी वापस मिल जाए जो गैर जिम्मेदार मीडिया कवरेज की वजह से दिल्ली पुलिस ने आनन-फानन में छीन ली थी।
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस का पत्थर कांड
पुरानी कहावत है जो दिखता है वैसा हो, ये हमेशा नहीं होता। टीआरपी की अंधी दौड़ में न्यूज चैनल्स इस पाठ को ही भूल गए लगते हैं। जिस रोज पत्थर कांड की 14 सेकेंड की क्लिप चैनलों पर आई सारी खबरें पीछे छूट गईं। न्यूज चैनलों में हो़ड़ शुरू हो गई नीचे गिरने की। आनन-फानन में फैसला सुना दिया गया कि दिल्ली पुलिस पत्थरमार है। बस 14 सेकेंड की क्लिप ने दिल्ली पुलिस की साख पर बट्टा लगा दिया। सतीश चंद्र की सत्ताइस साल की कमाई खाक हो गई। वो विलेन बन गए। ना किसी ने उनका पक्ष जानने की कोशिश की, ना ही किसी ने उस महिला की कहानी पर सवाल खड़ा करने की कोशिश की जो पलभर में टीवी स्टार बन चुकी थी। ऐसा नहीं था कि वीडियो क्लिपिंग में सवाल की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि जिस वक्त मैंने टीवी पर वो वीडियो देखा था उसी वक्त मेरे मन में घटना को लेकर सवाल खड़े हुए थे। सबसे बड़ा सवाल ईंट मारने को लेकर था।  हेड कांस्टेबल सतीश चंद्र ने ईंट मारी थी जरूर लेकिन क्या वो महिला को लगी थी? वीडियो में साफ था सतीश चंद्र के हाथ से जैसे ही ईंट छूटती है महिला पलटकर उसकी तरफ झपटती है। जरा सोचिये, अगर किसी की पीठ पर ईंट लगे वो फौरन पलटवार करने की स्थिति में होगा क्या? उसका पहला रिएक्शन होगा कि वो पीठ पकड़कर बैठ जाएगा लेकिन वीडियो में कहीं भी नहीं  दिखता कि महिला ईंट लगने से दर्द से बिलबिला हो उठी हो। यानी सतीशचंद्र ने ईंट उठाई जरूर लेकिन सिर्फ डराने के लिए और वो भी महिला के हिंसक रूप को देखने के बाद। लेकिन हमारे महान टीवी संपादकों ने इस पर गौर करने की जरुरत नहीं समझी क्योंकि पुलिस, सरकार या किसी संस्था को विलेन बनाकर पेश करना हमेशा आसान होता है और इससे कॉपी भी अच्छी बनती है और दर्शक भी इससे जुड़ते हैं। अगर मीडिया महिला के खिलाफ स्टैंड लेता तो शायद संपादकों को डर है कि दर्शकों में खबर को लेकर उतनी रुचि नहीं होगी।
लेकिन, कहते हैं सच्चाई को कितना भी ढँकने की कोशिश करो सच कभी छिप नहीं सकता। अगले ही रोज सतीश चंद्र द्वारा रिकार्ड झगड़े के ऑडियो ने पूरी कहानी को पलटकर रख दिया। ऑडियो से साफ हो गया कि ट्रैफिक लाइट जंप करने वाली महिला लाइसेंस और आरसी नहीं दिखाना चाहती थी। यहां तक कि उसने पुलिस को टुच्चा कहकर उकसाने की कोशिश की और सतीश चंद्र पर वायलेंट भी हुई। बाद में ये भी सामने आया है कि सरकारी अस्पताल ने एक्सरे और एमआरआई जांच में पाया कि महिला को कोई गंभीर चोट नहीं लगी है। उसका हाथ भी फ्रैक्चर नहीं हुआ है। महिला को उसी रोज डिस्चार्ज भी कर दिया था। यानी, महिला ने सहानुभूति पाने के लिए जो कहानी बुनी उसमें वो खुद ही उलझती नजर आ रही है।
सवाल उठता है कि मीडिया ने ये तफ्तीश करने की कोशिश पहले क्यों नहीं की? क्यों सिर्फ 14 सेकेंड के वीडियो पर भरोसा कर लिया? क्यों सिर्फ महिला के आरोप पर भरोसा कर लिया? मीडिया ने क्यों और चश्मदीदों से बात करने की कोशिश नहीं की? याद कीजिए। रोहतक चलती बस में छेड़छाड़ के मामले को। वहां भी मीडिया ने दो बहनों को रातोंरात स्टार बना दिया था  और फिर कुछ दिनों में ही पूरी कहानी पलट गई। आखिरी मीडिया ने उस मामले से सीख क्यों नहीं ली? क्या सिर्फ टीआरपी के लिए? टीवी संपादकों को इसका जवाब देना चाहिए।

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