About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Saturday, January 23, 2010

सहवाग से ज्यादा बड़बोले टीवी वाले


भारतीय क्रिकेट टीम चटगांव टेस्ट सौ से ज्यादा रनों से जीत गई, लेकिन टीवी वालों के चेहरे पर खुशी नहीं थी। पहला मौका था जब न्यूज चैनल टीम इंडिया की जीत का जश्न नहीं मना रहे थे। वजह- न्यूज चैनलों का एजेंडा पिट गया था। टेस्ट के पहले दिन से चैनल वाले सहवाग के बड़बोलेपन का जो ढोल पीट रहे थे, टेस्ट के आखिरी दिन टीम इंडिया ने उन्हीं की ढोल बजा दी। मैं पूछना चाहता हूं देश के खेल संपादकों से कि आखिर सहवाग का कसूर क्या था संपादक साहब?
चटगांव टेस्ट में नियमित कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की जगह टीम की कप्तानी करने वाले वीरेंद्र सहवाग ने टेस्ट की पूर्वसंध्या पर कहा था बांग्लादेश साधारण टीम है। वो टेस्ट में हमारे बीस विकेट नहीं निकाल सकती। टेस्ट के पहले रोज 200 रनों से पहले बांग्लादेश ने टीम इंडिया के आठ विकेट निकाल लिए। बस न्यूज चैनलों को कैसे मौका मिल गया। बड़बोले वीरू, कहां गई हेकड़ी जैसे शीर्षक चैनलों पर चलने लगे। हर बड़ा और अदना खेल पत्रकार (सिर्फ टीवी वाले) सहवाग की खिंचाई करने लगा। ऐसा लग रहा था कि मानो हम इंडियन नहीं बल्कि बांग्लादेश का चैनल देख रहे हों। ऐसा लग रहा था कि मानो सहवाग ने कोई गलत बात कह दी हो। मानो सहवाग ने बांग्लादेश को गाली दे दी हो। अरे संपादक महोदय, टेस्ट मैच पांच दिनों का होता है। हर रोज तीन सेशन होते हैं, यानि पंद्रह सेशन। पहले दिन तीन सेशन में खराब खेल का मतलब ये नहीं होता कि दूसरी टीम ने बाजी मार ली। आप रिपोर्टिंग करते वक्त क्रिकेट का बुनियादी वसूल क्यों भूल जाते हैं?
अंततः हुआ भी वही। आखिरी दिन लंच से पहले ही पिट गया बांग्लादेश। अब आप बताइये सहवाग की बात सही साबित हई या नहीं? आप बताइये सहवाग ने क्या गलत कहा था। वीरू ने कहा बांग्लादेश हमारे बीस विेकेट नहीं ले सकता। भारत ने दूसरी पारी चार सौ से ज्यादा रन बनाकर घोषित कर दी और सहवाग की बात सही साबित हुई। लेकिन, विंडबना देखिये। सहवाग की शाबाशी देने की बजाय न्यूज चैनलों को ये जीत फीकी नजर आने लगी। किसी ने स्लेजिंग वाला मसला उठाया तो किसी ने ये बकवास की कि बांग्लादेश पर सौ रनों की जीत कोई जीत है। अरे नासमझो, क्रिकेट में जीत का मतलब जीत होता है। रिकार्डबुक ये दर्ज नहीं होता कि आपने कितना संघर्ष किया, रिकार्ड बुक से ये मतलब होता है आप जीते या हारे। ये सिर्फ क्रिकेट की बात नहीं, ये आम जिंदगी की बात है। चुनाव को ही लीजिए। उम्मीदवार एक वोट से चुनाव जीते या पांच लाख वोटों से दोनों ही सूरत में पांच साल तक ही वो सांसद या विधायक रह सकता। उसी तरह, पढ़ाई का मामला लीजिए। आप कितने पढ़े लिखे हैं इसका फैसला इम्तिहान के नतीजे से होता है। आपको नौकरी मिलेगी या नहीं ये उसके इम्तिहान के नतीजों से तय होगा। तो वही बात क्रिकेट के मैदान में है। भारत ने मैच जीत लिया। आखिरी सच्चाई यही है। लेकिन क्या करें अपने खेल संपादकों का। उन्हें तो बस कुतर्क करना है।

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