
सुबह स्टार न्यूज पर बहस गर्मागर्म थी। नोएडा ऑथरिटी ने अवैध मोबाइल टावरों को सील करना शुरू कर दिया है। लोग परेशान हैं। रिपोर्टर ऑन स्पॉट उन लोगों के साथ खड़े थे, जिनकी जिंदगी मोबाइल नेटवर्क की तरह जाम हो गई थी। नोएडा के एडिशनल सीईओ पीएन बॉथम से फोन पर संपर्क साधा गया। बाथम ने प्रशासन का पक्ष रखा। कार्रवाई का बचाव किया। कहा-ये टॉवर सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए, बगैर इजाजत अवैध तरीके से रिहाइशी इलाकों में खड़े किए गए थे, इसलिए इन पर कार्रवाई जायज है।
यहां तक को सब ठीक चल रहा था, लेकिन इसके बाद एंकर और नोएडा ऑथरिटी के एडीशनल सीईओ के बीच जो बातें हुईं उसने एक बार फिर आज की सतही पत्रकारिता को नंगा कर दिया। बॉथम से एंकर सुमैरा खान पूछती हैं कि ये टॉवर पांच साल से लग रहे थे, तो कार्रवाई अब क्यों? बॉथम का जवाब था मोबाइल ऑपरेटरों को नोटिस भेजे गए थे। टॉवर धीरे-धीरे लग रहे थे। अब चूंकि समस्या गंभीर हुई है इसलिए कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन एंकर का सवाल बार-बार 'अब क्यों' पर अटका हुआ था।
मीडिया का ये 'अब क्यों' बहुत दिलचस्प सवाल है। अब क्यों? उस वक्त क्यों नहीं? स्टार न्यूज से पूछा जाना चाहिए क्या प्रशासन ने उस वक्त अगर थोड़ी लापरवाही बरती तो इसका मतलब क्या है अब कार्रवाई का हक नहीं बनता? मंत्रियों और अधिकारियों के एक-एक बयान की नुक्तानीची करने वाले मीडिया वालों को क्या इस वक्त नोएडा ऑथरिटी के साथ नहीं होना चाहिए जो देर से ही सही, एक जायज कार्रवाई के लिए सामने आया है?
ये बात हर कोई जानता है कि जब कोई नई चीज सामने आती है तो वो लोगों को सुविधाएं देता है तो पहले हम उसके दूसरे बुरे असर की अनदेखी करते हैं। मोबाइल के साथ भी ऐसा ही है। हर किसी की जिंदगी मोबाइल नेटवर्क से जुड़ गई है आज। ऐसे में मोबाइल कंपनियां बेहतर नेटवर्क के लिए धड़ाधड़ टॉवर लगा रही हैं। और ये टॉवर भी आम लोगों की छतों पर लग रहे हैं, जिन्होंने चंद कमाई के लिए खुद ही सुरक्षा मानकों से आंख मूंद रखा है।
ये मीडिया ही है जो लगातार इन खबरों को उछालता रहा है कि रिहाइशी बस्तियों में लगे मोबाइल टॉवर इंसानी सेहत के लिए खतरनाक हैं। चलिए, देर से ही सही कहीं से कोई कार्रवाई तो शुरू हुई है। ऐसे में इस कार्रवाई के पीछे खड़े होने की बजाय अगर मीडिया इसका साथ दे तो ज्यादा सही होगा। बेशक सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन उन लोगों से जिनकी छतों पर टॉवर लगे हैं। उनसे पूछना चाहिए क्या उन्हें इससे चिंता नहीं होती? टॉवर के आसपास रहने वालों को इससे पैदा होने वाले खतरों को बता कर पूछना चाहिए कि क्या मोबाइल नेटवर्क के लिए वो अपनी सेहत से समझौता कर सकते हैं? जो लोग मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने से परेशान हैं, उनसे पूछना चाहिए कि सिर्फ नेटवर्क से कनेक्ट रहने के लिए वो कितनी कीमत चुका सकते हैं? क्या वो इसके लिए अपने और अपने संतानों की सेहत दांव पर लगा सकते हैं? स्थानीय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि जब इतना बड़ा टॉवर खड़ा हो रहा था तो क्या उनकी आंखों पर पट्टी लगी थी?
बॉथम से उनके इस बयान पर, कि अगर मोबाइल ऑपरेटर अंडरटेकिंग दे दें तो आज ही सील तोड़ लिया जाएगा, पूछा जाना चाहिए कि क्या सिर्फ अंडरटेकिंग देने से सब ठीक हो जाएगा?
लेकिन, नहीं। मीडिया को सिर्फ 'अब क्यों?' का जवाब चाहिए क्योंकि इससे अच्छी हेडलाइन्स बन सकती है। नकारात्मक चीजें ऐसे भी लोगों की खींचती हैं। पता नहीं, कब इस प्रवृत्ति का अंत होगा।
नोट : इस खबर के दौरान स्टार न्यूज पर एक पीली पट्टी चल रही थी। अगर आपके इलाके में नेटवर्क खराब है तो स्टार न्यूज को फोन करें। दर्शकों के फोन मंगाने में हमेशा उत्सुक रहने वाला स्टार न्यूज भूल गया कि जिनका नेटवर्क खराब है वो भला कैसे फोन करेंगे और अगर कोई फोन करता है तो फिर नेटवर्क कैसे खराब हुआ।
यहां तक को सब ठीक चल रहा था, लेकिन इसके बाद एंकर और नोएडा ऑथरिटी के एडीशनल सीईओ के बीच जो बातें हुईं उसने एक बार फिर आज की सतही पत्रकारिता को नंगा कर दिया। बॉथम से एंकर सुमैरा खान पूछती हैं कि ये टॉवर पांच साल से लग रहे थे, तो कार्रवाई अब क्यों? बॉथम का जवाब था मोबाइल ऑपरेटरों को नोटिस भेजे गए थे। टॉवर धीरे-धीरे लग रहे थे। अब चूंकि समस्या गंभीर हुई है इसलिए कार्रवाई शुरू हुई है। लेकिन एंकर का सवाल बार-बार 'अब क्यों' पर अटका हुआ था।
मीडिया का ये 'अब क्यों' बहुत दिलचस्प सवाल है। अब क्यों? उस वक्त क्यों नहीं? स्टार न्यूज से पूछा जाना चाहिए क्या प्रशासन ने उस वक्त अगर थोड़ी लापरवाही बरती तो इसका मतलब क्या है अब कार्रवाई का हक नहीं बनता? मंत्रियों और अधिकारियों के एक-एक बयान की नुक्तानीची करने वाले मीडिया वालों को क्या इस वक्त नोएडा ऑथरिटी के साथ नहीं होना चाहिए जो देर से ही सही, एक जायज कार्रवाई के लिए सामने आया है?
ये बात हर कोई जानता है कि जब कोई नई चीज सामने आती है तो वो लोगों को सुविधाएं देता है तो पहले हम उसके दूसरे बुरे असर की अनदेखी करते हैं। मोबाइल के साथ भी ऐसा ही है। हर किसी की जिंदगी मोबाइल नेटवर्क से जुड़ गई है आज। ऐसे में मोबाइल कंपनियां बेहतर नेटवर्क के लिए धड़ाधड़ टॉवर लगा रही हैं। और ये टॉवर भी आम लोगों की छतों पर लग रहे हैं, जिन्होंने चंद कमाई के लिए खुद ही सुरक्षा मानकों से आंख मूंद रखा है।
ये मीडिया ही है जो लगातार इन खबरों को उछालता रहा है कि रिहाइशी बस्तियों में लगे मोबाइल टॉवर इंसानी सेहत के लिए खतरनाक हैं। चलिए, देर से ही सही कहीं से कोई कार्रवाई तो शुरू हुई है। ऐसे में इस कार्रवाई के पीछे खड़े होने की बजाय अगर मीडिया इसका साथ दे तो ज्यादा सही होगा। बेशक सवाल पूछे जाने चाहिए, लेकिन उन लोगों से जिनकी छतों पर टॉवर लगे हैं। उनसे पूछना चाहिए क्या उन्हें इससे चिंता नहीं होती? टॉवर के आसपास रहने वालों को इससे पैदा होने वाले खतरों को बता कर पूछना चाहिए कि क्या मोबाइल नेटवर्क के लिए वो अपनी सेहत से समझौता कर सकते हैं? जो लोग मोबाइल नेटवर्क कमजोर होने से परेशान हैं, उनसे पूछना चाहिए कि सिर्फ नेटवर्क से कनेक्ट रहने के लिए वो कितनी कीमत चुका सकते हैं? क्या वो इसके लिए अपने और अपने संतानों की सेहत दांव पर लगा सकते हैं? स्थानीय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए कि जब इतना बड़ा टॉवर खड़ा हो रहा था तो क्या उनकी आंखों पर पट्टी लगी थी?
बॉथम से उनके इस बयान पर, कि अगर मोबाइल ऑपरेटर अंडरटेकिंग दे दें तो आज ही सील तोड़ लिया जाएगा, पूछा जाना चाहिए कि क्या सिर्फ अंडरटेकिंग देने से सब ठीक हो जाएगा?
लेकिन, नहीं। मीडिया को सिर्फ 'अब क्यों?' का जवाब चाहिए क्योंकि इससे अच्छी हेडलाइन्स बन सकती है। नकारात्मक चीजें ऐसे भी लोगों की खींचती हैं। पता नहीं, कब इस प्रवृत्ति का अंत होगा।
नोट : इस खबर के दौरान स्टार न्यूज पर एक पीली पट्टी चल रही थी। अगर आपके इलाके में नेटवर्क खराब है तो स्टार न्यूज को फोन करें। दर्शकों के फोन मंगाने में हमेशा उत्सुक रहने वाला स्टार न्यूज भूल गया कि जिनका नेटवर्क खराब है वो भला कैसे फोन करेंगे और अगर कोई फोन करता है तो फिर नेटवर्क कैसे खराब हुआ।
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