वाह क्या पारी थी। आधुनिक टेस्ट क्रिकेट की बेहतरीन पारियों में एक। मुझे याद नहीं आता पिछले लंबे वक्त से किसी भारतीय बल्लेबाज ने ऐसी पारी खेली हो। हालांकि, सूरमा बल्लेबाजों की कमी नहीं अपने यहां। 499 मिनट, 394 गेंद। यानी आठ घंटे या 65 ओवर से भी ज्यादा बल्लेबाजी, फिर भी नाबाद। गजब!ट्वेंटी-ट्वेंटी के जमाने जबकि विकेट पर टिक कर खेलना गुजरे जमाने की चीज हो गई है, दक्षिण अफ्रीका के हासिम अमला ने दिखा दिया विकेट पर टिकने की कला मरी नहीं। अमला की उत्कट जिजीविषा को सलाम।
जिस समय अमला अकेले दम पर (हालांकि उन्हें दूसरे छोर से भी पुछल्ले पर्याप्त सहयोग कर रहे थे) कोलकाता टेस्ट बचाने के मिशन में लगे थे, याद आ रहा था नागपुर टेस्ट। याद आ रहे थे वो सारे टेस्ट जिसे भारतीय क्रिकेट टीम ने मामूली लापरवाही से गवां दिया। याद कीजिए नागपुर टेस्ट। सचिन और धोनी शानदार बल्लेबाजी कर रहे थे। सचिन ने शतक पूरा किया और विकेट खो बैठे। सचिन ने उस शतक पर विकेट खोया, जिसे वो शतक से पहले नहीं खेल रहे थे। यानी सचिन के दिमाग में कहीं बैठा था ये शॉट जोखिम भरा है और इसे नाजुक वक्त पर खेलना ठीक नहीं। ये क्या दर्शाता है? यही ना कि
सचिन के दिमाग अपना शतक सबसे ऊपर था, टीम को हार से बचाना नहीं? अगर सचिन के दिमाग में टीम ऊपर होती तो वो वैसा शॉट बिल्कुल नहीं खेलते। जितनी सावधानी उन्होंने 100 तक पहुंचने में बरती वो आगे भी बरतते। लेकिन नहीं, शतक पूरा हुआ और सचिन के लिए मिशन खत्म।ये सिर्फ सचिन की बात नहीं है। याद करने पर भी आपको ऐसे बहुत उदाहरण मिलेंगे जब नाजुक मैचों में भारतीय टीम का कोई मुख्य बल्लेबाज हासिम अमला की तरह नाबाद लौटा हो। हम पुछल्लों की लाख बुराई करें, लेकिन पहले तो मुख्य बल्लेबाजों को ही मिसाल पेश करना होगा ना।
इस वक्त मुझे याद आ रहे हैं एलन बॉर्डन और क्लाइव लॉयड। 1985-86 भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया दौरे पर गई थी। उस वक्त धर्मयुग के क्रिकेट विशेषांक में मंसूर अली खां पटौदी की समीक्षा पढ़ी थी। कंगारू टीम सिर्फ डेढ़ बल्लेबाजों की टीम है। एलन बॉर्डन एक बल्लेबाज और पूरी टीम आधी। लेकिन डेढ़ बल्लेबाजों की उसी टीम ने भारत को सीरीज ड्रा खेलने पर मजबूर कर दिया। जब टीम संकट में घिरी बॉर्डर चट्टान बनकर टिक गए। पुछल्लेबाजों के साथ उन्होंने लंबी-लंबी भागीदारी की। उनका एक ही फंडा था स्ट्राइक हमेशा अपने पास रखो।
उसी तरह 1983 में भारत-वेस्टइंडीज सीरीज में जब भी कपिल की टीम मेहमानों पर दबाव बनाया, लॉयड के पांव विकेट पर जम गए। उन्होंने निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ बड़ी-बड़ी भागीदारी की।
ये क्या दिखाता है? ये दिखाता है कि टीम के लिए बल्लेबाजी करना अलग बात है और रिकार्ड के लिए खेलना अलग बात। बेशक, सचिन आज बल्लेबाजी के शिखर पर हैं। सालों तक वो इसी तरह शिखर पर रहेंगे, लेकिन इससे विरोधी टीम को क्या फर्क करता है जब तक वो टीम के लिए रणनीति बनाकर बल्लेबाजी नहीं करते। विरोधी टीम के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है कि सचिन सिर्फ शतक बनाकर संतुष्ट हो जाएं। ये बात ना भूलें हारे हुए टेस्ट में आप शतक बनाते हैं या शून्य पर आउट होते हैं रन कोई मायने नहीं रखता। आपकी तारीफ तभी होगी जब आपने मैच बचा लिया या फिर आप अजेय लौटे। कम से कम तब आप कह पाएंगे कि आपको सपोर्ट नहीं मिला। सचिन आजतक ऐसे नहीं कर पाए। यही बात मुझे हमेशा परेशान करती है। यही बात आगे चलकर क्रिकेट के इतिहासकारों को भी कचोटेंगी। कन्फ्यूज करेंगी कि सचिन तेंदुलकर नाम शख्स को किस श्रेणी में रखें। रन को पैमाना बनाएंगे तो सचिन अतुलनीय नजर आएंगे और जरुरत के मुताबिक खेलने को पैमाना बनाएंगे तो शायद क्रिकेट के इस सूरज पर बादलों का धब्बा नजर आएगा।
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