About Me

पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।

Wednesday, February 3, 2010

आशुतोष के बहाने

पिछले दिनों आईबीएन7 के मैनेजिंग एडीटर आशुतोष रण फिल्म देखकर निकले। महोदय इतने सम्मोहित थे कि उन्हें फिल्म में आईना दिख गया। हंसी आ गई पढ़ कर। क्या महाराज, आपको इतना बड़ा पत्रकार मान रहा था और आपको आईना देखने के लिए फिल्म देखने की जरुरत पड़ गई। कैसे पत्रकार हैं आप? हर रोज जो इतने ब्लॉग्स और पोर्टल में आईना दिखाया जा रहा था वो नहीं देखते थे? नेता हों या आम लोग हर रोज जो इलैक्ट्रानिक मीडिया के कामकाज पर प्रवचन देते थे, उसे नहीं सुनते थे क्या आशुतोषजी? धन्य हैं महाराज आप। चलिए कम से कम रण के रूप में आपको बोधिवृक्ष तो मिला। आपके ज्ञान चक्षु तो खुले। अब कहिये। कहां जाएंगे आप? बुद्ध की तरह घर (न्यूज रूम) छोड़ ज्ञान की खोज में निकलेंगे?
दरअसल इन दिनों बुद्धिजीवी दिखने का नया दौर चल पड़ा है। इलैक्ट्रानिक मीडिया को गरियाने का दौर। जो जितना गरिया सकता है वो उतना बड़ा बुद्धिजीवी। जो लोग इस मीडिया के हिस्से हैं वो भी गरिया रहे हैं और इस बहती गंगा में वो भी डुबकी लगा रहे हैं जो न्यूज चैनलों के दफ्तर के आसपास भी फटक नहीं पाए। ब्लॉग्स, मीडिया की खबरें देने वाले पोर्टल ऐसे लेखों से भरे पड़े हैं, जिसमें किसी ना किसी वजह से न्यूज चैनलों को पानी पी-पीकर गाली दी गई हो। मुद्दा चाहे कंटेंट का हो या फिर काम के माहौल का। इलेक्ट्रानिक मीडिया के हिस्से तारीफ ना के बराबर मिल रही है।
बेशक, इसके पीछे न्यूज़ चैनल जिम्मेदार हैं। वो अपना बचाव अपने काम से नहीं कर पा रहे, बल्कि वो भी आलोचनाओं के आगे नतमस्तक होकर आत्म चिंतन की जगह खुद की आलोचना करने में लग गए हैं। एनडीटीवी के रवीश कुमार, न्यूज24 के अजीत अंजुम, आईबीएन7 के आशुतोष इसकी मिसाल हैं। मैं पूछना चाहता हूं इन महामहिमों से आखिर वो कौन-सी नजीर पेश करना चाहते हैं। ये तीनों अपने-अपने चैनलों में इस पोजीशन में हैं, जहां से चैनल को ड्राइव कर सकें। इनकी नजर में जो कमजोरी है वो दूर कर सकें। फिर ये ब्लॉग्स और लेखों के जरिये किस बात का रोना रो रहे हैं। क्या वो अपने विचारों से उन मझोले और निचले (पद में) स्तर के पत्रकारों में कुंठा और भटकाव पैदा नहीं कर रहे? ये इनके विचारों से ये ध्वनि नहीं निकल रही कि हम हारे हुए लोग हैं।
अगर रवीश, आशुतोष और अंजुम जैसों को लगता है कि वो कुछ नहीं कर सकते हैं तो फिर मोटी सैलरी पर कुंडली मार कर क्यों बैठे हुए हैं? अगर गिरेबां में झांकने की इतनी ईमानदारी और हिम्मत है तो क्यों नहीं टेलीविजन से वनवास ले लेते? शायद ये खुद को गरियाकर लोगों के बीच ईमानदार दिखते रहना चाहते हैं ताकि अपना एजेंडा भी बना रहे और ईमानदार पत्रकार का लेबल भी बना रहे। ऐसा नहीं चलेगा भाई साब।
ये आप ही जैसों की करनी है कि आज हर कोई न्यूज चैनलों को गाली देने लगा है। लोगों की हिमाकत इतनी बढ़ गई है कि अब वो न्यूज चैनलों के अंदर के काम के माहौल पर भी उंगली उठाने लगे हैं। जिन लोगों को न्यूज रूम में घुसने की भी हिम्मत नहीं होगी वो इसे रंडीबाजी (भंडास में एक लेख) का पेशा तक कहने लगे हैं। आखिर ये हिम्मत कहां से आई? जनाब ये हिम्मत आप लोगों ने ही दी है। आप नाकाम हो चुके हैं। आपके विचार कुम्हला चुके हैं। रवीश ने जिस गोबर के ढेर का जिक्र किया था, आपके विचारों से गोबर की बदबू आने लगी है। अच्छा हो आप लोग यहां से कट लीजिए। नए लोगों के लिए रास्ता खाली कीजिए ताकि ताजे विचारों की धार बनी रहे।

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