
गुलजार पर लगा है चोरी का आरोप। गाने का मुखड़ा चुराने का आरोप। गुलजार एक से बढ़कर एक गीत दे चुके हैं। ऑस्कर तक जीत चुके हैं। उनके गाने जब भी आते हैं खुशनुमा झोंके की तरह संगीतप्रेमियों पर छा जाते हैं। ऐसे में भरोसा नहीं हुआ कि गुलजार जैसा शख्स ऐसा काम कर सकता है। गुलजार पर आरोपों का सामने आना था कि इंटरनेट पर एक-एक कर सच्चाई बाहर आने लगी। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का वो गीत भी सामने आ गया, जो उन्होंने लिखी थी। सर्वेश्वर के गीत और गुलजार के गाने को पढ़कर कोई भी कहेगा कि दोनों में कोई मेल नहीं। लेकिन इसमें भी दो राय नहीं कि गुलजार आरोपों से भाग नहीं सकते। गाने के बोल बेशक अलग हैं, लेकिन गुलजार पूरी तरह से सर्वेश्वर से प्रेरित लगते हैं। ऐसे में नैतिकता का यही तकाजा है कि उन्हें ये मान लेना चाहिए और सर्वेश्वर को भी इसका श्रेय देना चाहिए।
हालांकि गुलजार पर तोहमत लगाने से पहले मैं इस विवाद में उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा था। आज दिल्ली टाइम्स में जब मैंने उनकी प्रतिक्रिया देखी तो रहा नहीं गया और ब्लॉग लिखने बैठ गया। गुलजार साहब फरमाते हैं कि उनके गाने में सिर्फ इब्नतूता समान है। सर्वेश्वर का इब्नतूता जूता पहन के निकलना है, जबकि गुलजार का इब्नतूता जूता बगल में दबा के निकला है। गुलजार कहते हैं कि इब्नतूता शब्द पर तो किसी की कॉपीराइट नहीं हो सकती। ऐसे में वो सर्वेश्वर को क्रेडिट क्यों ना दें?
वाह गुलजार साहब वाह! कम से कम आप के मुंह ये सुनने की तमन्ना नहीं थी। लेकिन आप भी वैसे ही महान निकले, जिन्हें नैतिकता की परवाह नहीं। लोकप्रियता की पिनक में आपको भी लगता है कि आपने जो लिख दिया वो ब्रह्म वाक्य है। नहीं गुलजार साहब, ऐसा नहीं है। इब्नतूता कोई आम शब्द नहीं है। आप ही बताइये अब तक कितने लोगों ने इसे गीत या गाने में इस्तेमाल किया
है? आप गीतकार हैं। ऐसे में ये मानने का तो सवाल ही नहीं होता कि आपने सर्वेश्वर की कविता नहीं पढ़ी होगी। आइडिया की खोज में तो आप लोग इधर--उधर मुंह मारते ही रहते हैं। आपने सर्वेश्वर को जरूर पढ़ा होगा। रही बात जूता पहनने की या बगल में रखने की, क्या फर्क पड़ता है। इब्नतूता है, जूता है। भावना वही है बस बोल अलग हैं। ऐसे में चोरी तो हुई ही ना गुलजार साहब। आप जैसे योग्य गीतकार भला पूरा का पूरा गाना थोड़े ही चुरा सकते हैं?
लेकिन आपने दिल दुखाया है गुलजार साहब। आपको गलती मान लेनी चाहिए। इससे लोगों की नजरों में आपका कद बड़ा ही होता, लेकिन शायद आपको लगा होगा कि बॉलीवुड में आपका कद बड़ा है। आप भला कैसे झुक सकते हैं। चलिये, करोड़ों संगीत प्रेमियों नहीं बल्कि उस बेटी की नजरों से सोचिये, जिसके पिता ने सर्दी की सुबह उसे स्कूल छोड़ते वक्त ये गीत लिखी थी। जी हां,सर्वेश्वर की बेटी शुभा। ये गीत आज भी शुभा की यादों से जुड़ा होगा। क्या वो आपको माफ कर पाएगी? क्या आप उसे मुंह दिखा पाएंगे? लेकिन आपको क्या फर्क पड़ता है। आपतो गुलजार हैं।
हालांकि गुलजार पर तोहमत लगाने से पहले मैं इस विवाद में उनकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रहा था। आज दिल्ली टाइम्स में जब मैंने उनकी प्रतिक्रिया देखी तो रहा नहीं गया और ब्लॉग लिखने बैठ गया। गुलजार साहब फरमाते हैं कि उनके गाने में सिर्फ इब्नतूता समान है। सर्वेश्वर का इब्नतूता जूता पहन के निकलना है, जबकि गुलजार का इब्नतूता जूता बगल में दबा के निकला है। गुलजार कहते हैं कि इब्नतूता शब्द पर तो किसी की कॉपीराइट नहीं हो सकती। ऐसे में वो सर्वेश्वर को क्रेडिट क्यों ना दें?
वाह गुलजार साहब वाह! कम से कम आप के मुंह ये सुनने की तमन्ना नहीं थी। लेकिन आप भी वैसे ही महान निकले, जिन्हें नैतिकता की परवाह नहीं। लोकप्रियता की पिनक में आपको भी लगता है कि आपने जो लिख दिया वो ब्रह्म वाक्य है। नहीं गुलजार साहब, ऐसा नहीं है। इब्नतूता कोई आम शब्द नहीं है। आप ही बताइये अब तक कितने लोगों ने इसे गीत या गाने में इस्तेमाल किया
है? आप गीतकार हैं। ऐसे में ये मानने का तो सवाल ही नहीं होता कि आपने सर्वेश्वर की कविता नहीं पढ़ी होगी। आइडिया की खोज में तो आप लोग इधर--उधर मुंह मारते ही रहते हैं। आपने सर्वेश्वर को जरूर पढ़ा होगा। रही बात जूता पहनने की या बगल में रखने की, क्या फर्क पड़ता है। इब्नतूता है, जूता है। भावना वही है बस बोल अलग हैं। ऐसे में चोरी तो हुई ही ना गुलजार साहब। आप जैसे योग्य गीतकार भला पूरा का पूरा गाना थोड़े ही चुरा सकते हैं?लेकिन आपने दिल दुखाया है गुलजार साहब। आपको गलती मान लेनी चाहिए। इससे लोगों की नजरों में आपका कद बड़ा ही होता, लेकिन शायद आपको लगा होगा कि बॉलीवुड में आपका कद बड़ा है। आप भला कैसे झुक सकते हैं। चलिये, करोड़ों संगीत प्रेमियों नहीं बल्कि उस बेटी की नजरों से सोचिये, जिसके पिता ने सर्दी की सुबह उसे स्कूल छोड़ते वक्त ये गीत लिखी थी। जी हां,सर्वेश्वर की बेटी शुभा। ये गीत आज भी शुभा की यादों से जुड़ा होगा। क्या वो आपको माफ कर पाएगी? क्या आप उसे मुंह दिखा पाएंगे? लेकिन आपको क्या फर्क पड़ता है। आपतो गुलजार हैं।
पाठकों के लिए पेश है सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता
इब्नबतूता
पहन के जूता
इब्नबतूता
पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई
थोड़ी घुस गई कान में
कभी नाक को
कभी कान को
मलते इब्नबतूताट
इसी बीच में निकल पड़ा
उनके पैरों का जूता
उड़ते उड़ते उनका जूता
पहुंच गया जापान में
इब्नबतूता खड़े रह गये
मोची की दूकान में
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
ये है गुलजार का गाना
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्रर
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ जावे चिडिया फुर्रर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
अगले मोड़ पे, मौत खड़ी है
अरे मरने की भी क्या जल्दी है
होर्न बजाके, आवत जनमें
हो दुर्घटना से देर भली है
चल उड़ जा उड़ जा फुर फुर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
पहने तो करता है चुर्रर
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ उड़ आवे आ आ, दाना चुगे आ आ
उड़ जावे चिडिया फुर्रर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
अगले मोड़ पे, मौत खड़ी है
अरे मरने की भी क्या जल्दी है
होर्न बजाके, आवत जनमें
हो दुर्घटना से देर भली है
चल उड़ जा उड़ जा फुर फुर
इब्ने बतूता ता ता ता
इब्ने बतूता ता ता, बगल में जूता ता ता
कौन था इब्नतूता?
गाने में इब्नतूता का जिक्र है। आप सोच रहे होंगे कि ये सिर्फ कवि की कल्पना है या फिर इतिहास में इसका कोई अस्तित्व है। आपको बता दें इब्नतूता एक महान सैलानी थे। इब्ने बतूता का पूरा नाम ‘अबु अब्दुल्ला मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला अल लवाती अल तांजी इब्ने बतूता’ है, जो अपने यात्रा करने के फितूर के लिए मशहूर हैं। 14वीं शताब्दी में जन्मे मोराक्को के इस इस्लामी विद्वान ने 30 साल तक विभिन्न देशों की यात्रा की।
इस घुम्मकड़ ने दुनिया के सारे इस्लामी देशों के अलावा अफ्रीका और यूरोप, भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग 75,000 मील की यात्रा की और इस दौरान उन्होंने कई खतरों का सामना किया और उनका सफर काफी रोमांचकारी रहा। मोरक्को के सुल्तान ने इब्ने बतूता की यात्रा को देखते हुए एक किताब लिखवाई और हम उसका अनुवाद ‘रिहला माई ट्रैवल्स’ आज भी पढ़ सकते हैं।
गाने में इब्नतूता का जिक्र है। आप सोच रहे होंगे कि ये सिर्फ कवि की कल्पना है या फिर इतिहास में इसका कोई अस्तित्व है। आपको बता दें इब्नतूता एक महान सैलानी थे। इब्ने बतूता का पूरा नाम ‘अबु अब्दुल्ला मोहम्मद इब्न अब्दुल्ला अल लवाती अल तांजी इब्ने बतूता’ है, जो अपने यात्रा करने के फितूर के लिए मशहूर हैं। 14वीं शताब्दी में जन्मे मोराक्को के इस इस्लामी विद्वान ने 30 साल तक विभिन्न देशों की यात्रा की।
इस घुम्मकड़ ने दुनिया के सारे इस्लामी देशों के अलावा अफ्रीका और यूरोप, भारतीय उपमहाद्वीप की लगभग 75,000 मील की यात्रा की और इस दौरान उन्होंने कई खतरों का सामना किया और उनका सफर काफी रोमांचकारी रहा। मोरक्को के सुल्तान ने इब्ने बतूता की यात्रा को देखते हुए एक किताब लिखवाई और हम उसका अनुवाद ‘रिहला माई ट्रैवल्स’ आज भी पढ़ सकते हैं।
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