राहुल ने ठाकरे की मांद में छापा मारा- हिन्दुस्तान टाइम्स
ठाकरे के गढ़ में बेधड़क घूमे राहुल- हिन्दुस्तान
ये चंद सुर्खियां हैं आज के अखबारों की। इससे पहले न्यूज चैनल काफी कुछ कह चुके हैं। जैसे- राहुल का शिव सेना को ठेंगा। राहुल के आगे टांय-टांय फिस्स हुई शिव सेना आदि, आदि।सुबह से देर रात तक न्यूज चैनलों पर सिर्फ राहुल छाए थे। टीवी चैनलों पर कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला कह रहे थे राहुल ने अदम्य साहस का परिचय दिया। शिव सेना अलग थलग पड़ गई। ऐसा लग रहा था मानो राहुल के मुंबई ने सारी समस्या हल दी हो। अब वहां उत्तर भारतीयों को कोई समस्या नहीं। राहुल ने शिव सैनिकों को शरमा दिया है। अब वो बिहारियों या यूपी वालों की तरह आंख उठाकर भी नहीं देखेंगे।
सवाल उठता है कि क्या कल की कहानी बस इतनी साधारण सी है? शायद नहीं। राहुल के दौरे से ना तो शिव सेना पस्त हुई है ना ही राहुल या कांग्रेस अपने सिर जीत का सेहरा बांध सकती है। राहुल ने जो कुछ किया वो अति सुरक्षा के दायरे में किया। याद कीजिए आपने ऐसा कब देखा होगा राज्य का मुख्यमंत्री अपनी पार्टी के एक महासचिव के दौरे के लिए घंटों सड़क पर पुलिस की तरह पहरेदारी करता है? आपने ऐसा कब देखा होगा एक कांग्रेस सांसद की सुरक्षा के लिए मुंबई जैसे महानगर की पूरी पुलिस सड़क पर उतार उतर जाती है? आपने ऐसा कब देखा जब मुंबई के पुलिस कप्तान समेत मुंबई के तमाम आला पुलिस अधिकारी सड़कों पर ट्रैफिक सिपाही की तरह मोर्चा संभाले हुए हैं? जब राज ठाकरे के गुंडे गैरमराठियों को पीट रहे थे, शिव सैनिक उधम मचा रहे थे, तब ऐसा नहीं देखा गया। अगर ऐसा होता तो आज ये समस्या नहीं होती।

लेकिन, बाल ठाकरे के सिर्फ एक बयान ने, कि शिव सैनिक राहुल को काला झंडा दिखाएं, मुंबई की सरकार और पुलिस में हड़कंप मचा दिया है। ऐेसे में अगर राहुल चार घंटे तक मुंबई में सीना तानकर घूमे तो किसने कौन-सा तीर मार लिया। अगर इसके बावजूद शिव सैनिक कुछ कर लेते तो क्या सरकार और पूरी प्रशासन की काबिलियत पर सवाल नहीं उठता? क्या ये साबित नहीं हो जाता कि जो पुलिस मुट्ठी भर शिव सैनिकों को नहीं रोक सकती वो आतंकवाद से कैसे लोहा लेगी? फिर, अब तो ये भी खबरें आ रही हैं कि राहुल का मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर पहले से तय था और इसके लिए पहले से ना दिखने वाला सुरक्षा बंदोबस्त किए गए। यानी कल तक जिसे राहुल का साहस बताया जा रहा था उसकी भी अब पोल खोल गई। जाहिर है, राहुल विजेता बनकर नहीं उभरे हैं। अगर उनमें विजेता बनने की चाहत होती तो वो आम लोगों की तरह मुंबई जाते। आम नहीं तो कम से कम वैसे जैसे से दूसरे शहरों में वो जाते हैं। लेकिन, ना तो राहुल ने ऐसा किया ना ही महाराष्ट्र की सरकार ने। उल्टे महाराष्ट्र की सरकार ने तो साबित कर दिया कि आम लोगों के लिए उनकी सुरक्षा पुख्ता नहीं है। अगर होती तो कम से कम मुख्यमंत्री और पुलिस को कप्तान को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता।
अब बात मीडिया की। क्या राहुल का मुंबई दौरा वाकई इतना अहम था कि उस पर इतना सारा एयर टाइम और न्यूज प्रिंट खर्च किया जाए? क्या राहुल के दौरे से किसी को कुछ हासिल होना था? या क्या किसी को कुछ हासिल हुआ? नहीं। फिर ये बेकार का झमेला क्यों? जाहिर है इससे शिव सेना को ही पब्लिसिटी मिली।
आखिर सवाल, मुंबई में ये संकट कैसे पैदा हुआ? क्या इसके लिए कहीं ना कहीं मीडिया तो दोषी नहीं? पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम पर गौर करें तो पाएंगे कि शाहरुख का पुतला फूंकने और उनकी फिल्म माइ नेम इज खान का पोस्टर छापने के सिवा मुंबई में कोई गंभीर घटना नहीं हुई है। बस, बाल ठाकरे सामना में गाली गलौज की भाषा में संपादकीय लिखते हैं और बाकी का काम तिल का ताड़ बनाकर न्यूज चैनल कर देता हैं। जरा सोचिये, सामना मुंबई के बाहर कितने लोग पढ़ते हैं। मुंबई में भी सारे लोग उसे नहीं पढ़ते। ऐसे में अगर न्यूज चैनल उसे बार-बार ना दिखाएं तो शायद हालात उतने खराब ना दिखें जितना राष्ट्रीय चैनलों पर बाल ठाकरे का बयान आने के बाद दिखने लगता है। लेकिन, बात इतनी नहीं है। उसके बाद शुरू होता है प्रतिक्रियाओं का दौर। हमारा देश तो ऐसे भी बयानवीरों का देश है। इसमें कौन पीछे हटता है। फिर मामला धीरे-धीरे वाक्युद्ध में तब्दील हो जाता है और बातों की गर्मी का सड़कों पर उतरने का खतरा बन जाता है। मुंबई का ताजा संकट कुछ ऐसा ही है। सामना में सिर्फ बयानबाजी हो रही है और उसी से खौफ का माहौल बन गया। लेकिन, जरा सोचिये अगर हर फालतू बयानों को मीडिया ना उछाले तो क्या ये स्थिति आती? लेकिन, इसमें मीडिया का उल्लू सीधा हो रहा है। पिस रही है तो सिर्फ जनता, जो तमाशा देखने के लिए मजबूर है।
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