आज दिल्ली से निकलने वाले अखबार हिन्दुस्तान का पहला पेज देखिये। तस्वीरों के साथ सात कॉलम में खबर छपी है- कर्म का फल : रुचिका से छेड़छाड़ के दोषी राठौर पर अदालत के बाहर चाकू से हुआ हमला।
वाह संपादक महोदय। तो क्या अब अखबार भी सड़क के इंसाफ में यकीन करने लगे हैं? क्या हिन्दुस्तान के संपादक को अदालत पर भरोसा नहीं रहा? अगर होता तो शायद राठौर पर चंडीगढ़ कोर्ट के बाहर हुए हमले को कर्म का फल नहीं कहते। सार्वजनिक रूप से ये कहने की हिम्मत तो रुचिका पक्ष के लोग भी नहीं कर पाए। रुचिका की सहेली आराधना और उनके पिता आनंद प्रकाश ने बिल्कुल सतर्क प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि किसी को भी कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। यही सभ्य समाज का तकाजा भी है। इसी से ही सुचारु व्यवस्था चल सकती है। इसी रास्ते से सही इंसाफ भी मिल सकता है।
लेकिन, अगर कोई अखबार किसी हमले को कर्म का फल कहने लगे तो डर लगने लगता है। ये ठीक है कि राठौर एक अदालत से दो महीने की सजा पा चुके हैं, लेकिन अभी दूसरी अदालतों में उनका ट्रायल चल रहा है। ऐसे में उनके कर्मों का फल तय करने वाले अखबार वाले कैसे हो सकते हैं? क्या एक तरह ये उकसाने वाली कार्रवाई नहीं है? क्या इससे समाज में गलत संदेश नहीं जा रहा? कल अगर हिन्दुस्तान के संपादक पर कोई गंभीर आरोप लगाता है और फिर उन पर ऐसा ही कुछ होता है तो क्या इसे कर्मों का फल कहना उचित लगेगा उन्हें?
लेकिन, अखबारों में ऐसा अतिरेक पहली बार नहीं हुआ है। एक अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबर मुझे आज भी याद है। कटिंग मेरे पास नहीं है इसलिए नाम का उल्लेख नहीं कर रहा। खबर ये थी कि बलात्कार के एक आरोपी की बहन के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कार उस लड़की के भाई ने किया था, जिसके साथ आरोपी ने बलात्कार किया था। ये खबर कुछ इस तरह लिखी गई थी। ऊपर वाले की लाठी जब चलती है तो आवाज नहीं करती है। ये ऊपर वाले का इंसाफ है। ना तो रिपोर्टर ने ना ही संपादक ने इतनी संवेदना समझी कि किसी के भाई ने अगर बलात्कार किया है तो उस बहन का क्या दोष? क्या बलात्कार के बदले बलात्कार ऊपर वाले का न्याय हो सकता है?
जाहिर है ऐसे मामलों में संपादकों को थोड़ा विवेक से काम लेना चाहिए और तठस्थ होकर रिपोर्टिंग करनी चाहिए।
About Me
- reporter
- पेशे से पत्रकार हूं। जब भी आसपास कुछ घटते देखता हूं तो कुछ कहने का मन करता है। कुछ ऐसा जो टीवी नहीं कहता। अखबार नहीं लिखते। कई बातें हैं जो काम के दायरे में रहकर नहीं कह सकता। लिहाजा ब्लॉग पर आया हूं। शायद मन की बात रख सकूं।
Tuesday, February 9, 2010
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Tahe dilse swagat hai!
ReplyDeleteअच्छी लगी आपकी रचना .. इस नए चिट्ठे के साथ हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
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