अच्छा लगा कोलकाता टेस्ट के बाद भारतीय क्रिकेट टीम के ऑफ स्पिनर हरभजन सिंह का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर फूटना। अच्छा लगा भज्जी का ये कहना कि वो या धोनी या टीम इंडिया का कोई और खिलाड़ी इडियट नहीं हैं। हरभजन सिंह का इशारा नागपुर टेस्ट में करारी हार के बाद न्यूज चैनलों में दिखाए गए कार्यक्रमों पर था, जिसमें कोई चैनल मैच का मुजरिम ढूंढ़ रहा था तो किसी को टीम इंडिया के पप्पू की तलाश थी।ऐतिहासिक ईडन गार्डन में भज्जी टीम इंडिया की जीत के हीरो थे और उन्हें पूरा हक था मीडिया को आईना दिखाना। उनका ये कहना अच्छा लगा कि एक मैच की हार के बाद खिलाड़ियों के परफॉर्मेंस की इतनी नुक्ता-चीनी ठीक नहीं। खेल को खेल की तरह लो, इसे लड़ाई या राष्ट्र सम्मान का प्रतीक मत बनाओ।
भज्जी कहते हैं कि खिलाड़ियों को इडियट कहना प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए अच्छा हो सकता है, लेकिन इसमें जरा-भी संवेदनशीलता नहीं। वाह भज्जी! तो अब आपको भी अहसास हो गया कि टीवी वाले प्रोग्राम को मसालेदार बनाने के लिए ऐसा करते हैं। यानी न्यूज चैनलों के जिस खोखलेपन को आम दर्शक महसूस कर रहे थे, उसे अब विश्वसनीय आवाज भी मिलने लगी है।
चूंकि मैं खुद एक पत्रकार हूं और न्यूज चैनल से जुड़ा हुआ हूं, लिहाजा मैं समझ सकता हूं भज्जी की कसक। न्यूज चैनलों का सपाट सा फॉर्मूला हो गया है। क्रिकेट बिकता है। टीम जीते तो आसमान पर चढ़ा दो, हारे तो खलनायक बना दो। यहां बीच का कोई रास्ता नहीं होता। हर मैच में न्यूज चैनलों का नजरिया बदलता रहता है। एक मैच में खिलाड़ी हीरो बन जाते हैं, दूसरे मैच में जीरो। अगर आप सचिन तेंदुलकर नहीं हैं तो आपका भगवान ही मालिक। क्योंकि सिर्फ सचिन तेंदुलकर ही एकमात्र खिलाड़ी हैं जिनकी न्यूज चैनलों पर ज्यादा आलोचना नहीं होती। आलोचना होती भी है तो पप्पू या इडियट की हद तक नहीं, भले ही मैच हराने में उनकी भूमिका क्यों ना हो।
दरअसल, न्यूज चैनलों में अतिरेक बिकता है या फिर अतिरेक को बेचने की कोशिश होती है। न्यूज चैनल या तो हीरो ढूंढ़ते हैं या फिर विलेन। कैरेक्टर आर्टिस्ट की यहां जगह नहीं है। खेल की बारीकियों पर बहस की यहां गुंजाइश नहीं होती, सिर्फ शोर होता है। आगे कभी आप गौर कीजिएगा क्रिकेट पर होने वाले न्यूज चैनलों के विशेष कार्यक्रमों पर। आधे घंटे आप देखते रह जाएंगे लेकिन आपको स्कोर का पता ही नहीं चलेगा। इसकी जगह आपको दिखेगा सिर्फ बकबास। या तो खिलाड़ियों को नीचा दिखाया जा रहा होगा या फिर उन्हें आसमान पर चढ़ाया जा रहा होगा। क्रिकेटीय समीक्षा कहीं नहीं मिलेगी। स्कोर मिलेगा तो सिर्फ टिकर या स्लग में।
कोलकाता टेस्ट को ही लीजिए। टीम इंडिया जीत गई और शुरू हो गया न्यूज चैनलों पर जीत का तराना। सारे चैनलों का रंग तिरंगा हो गया। पटाखे छूटने लगे। हर खिलाड़ी हीरो बन गया। जिस एक शख्स ने पूरे आठ घंटे तक टीम इंडिया को जीत से दूर रखा, जिसने एक वक्त पर टीम इंडिया में निराशा की लहर फैला दी थी, जीत के शोर में उसकी कोई चर्चा नहीं। जी हां, मैं बात हासिम अमला की कर रहा हूं। अगर क्रिकेटीय मैरिट पर बात होती तो अमला पर बहस की बहुत गुंजाइश होती। अमला के बहाने भारतीय क्रिकेटरों को कसौटी पर कसने की कोशिश हो सकती थी। लेकिन, न्यूज चैनलों ने जीत के शोर में इस पहलू को छुआ ही नहीं। शायद अमला से उन्हें अच्छी रेटिंग नहीं मिल सकती थी।
याद आता है कुछ साल पहले स्टार न्यूज ने वाह क्रिकेट में आक्रामक तेवर अपना रखे थे। हर बात पर खिलाड़ियों की ऐसी की तैसी। उनकी स्क्रिप्ट से ऐसा लगता था कि अगर स्टार के खेल पत्रकारों को कलम की जगह बल्ला या गेंद थमा दिया जाए तो वो सचिन और मुरली को पीछे छोड़ देंगे। इस वक्त वैसे ही तेवर इंडिया टीवी के हैं। खिलाड़ी तो उन्हें आला दर्जे के बेवकूफ और नौसिखुवे नजर आते हैं। जाहिर है, इन्हीं वजहों से न्यूज चैनलों की विश्वसनीयता घटी है और अब खिलाड़ी भी मौका मिलता ही प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों को जलील कर देते हैं।
तो बाज आयो मीडिया वालो। ये सीख गांठ बांध लो-तोल मोल के बोल। नहीं तो फिर कोई भज्जी तुम्हें आईना दिखाने आ जाएगा।
achha laga
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